वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र १२ ] अध्याय २ २५५
सूत्र १२ ] अध्याय २ २५५
करण न होनेके कारण; दोषः=उक्त दोष; न=नहीं है; हि=क्योंकि; तथा=इसका
करण होना कैसा है, यह बात; दर्शयति=श्रुति स्वयं दिखाती है।
व्याख्या—जिस प्रकार चक्षु आदि इन्द्रियाँ रूप आदि विषयोंका ज्ञान
करानेमें करण हैं, इस प्रकार विषयोंके उपभोगमें करण न होनेपर भी
उसको जीवात्माके लिये करण माननेमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि उन सब
इन्द्रियोंको प्राण ही धारण करता है, इस शरीर और इन्द्रियोंका पोषण भी
प्राण ही करता है, प्राणके संयोगसे ही जीवात्मा एक शरीरको छोड़कर दूसरे
शरीरमें जाता है। इस प्रकार श्रुतिमें इसके करणभावको दिखाया गया है
(छा० उ० ५।१।६ से प्रकरणकी समाप्तितक)। इस प्रकरणके सिवा और
भी जहाँ-जहाँ मुख्य प्राणका प्रकरण आया है, सभी जगह ऐसी ही बात कही
गयी है (प्र० उ० ३।१ से १२ तक)।
सम्बन्ध—इतना ही नहीं, अपितु—
पञ्चवृत्तिर्मनोवद् व्यपदिश्यते ॥ २।४।१२॥
मनोवत् (श्रुतिके द्वारा यह) मनकी भाँति; पञ्चवृत्तिः=पाँच वृत्तियोंवाला;
व्यपदिश्यते=बताया जाता है।
व्याख्या—जिस प्रकार श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियोंके रूपमें मनकी
पाँच वृत्तियाँ मानी गयी हैं, उसी प्रकार श्रुतिने इस मुख्य प्राणको भी पाँच
वृत्तिवाला बताया है (बृह० उ० १।५।३)। प्राण, अपान, व्यान, समान
और उदान—ये ही उसकी पाँच वृत्तियाँ हैं, इनके द्वारा यह अनेक प्रकारसे
जीवात्माके उपयोगमें आता है। श्रुतियोंमें इसकी वृत्तियोंका भिन्न-भिन्न
कार्य विस्तारपूर्वक बताया गया है (प्र० उ० ३।४ से ७)। इसलिये भी
प्राणको जीवात्माका उपकरण मानना उचित ही है।
सम्बन्ध—मुख्य प्राणके लक्षणोंका प्रतिपादन करनेके लिये नवें सूत्रसे
प्रकरण आरम्भ करके बारहवें सूत्रतक यह सिद्ध किया गया है कि ‘प्राण’ जीवात्मा
तथा वायुतत्त्वसे भी भिन्न है। मन और इन्द्रियोंको धारण करनेके कारण यह
भी जीवात्माका उपकरण है। शरीरमें यह पाँच प्रकारसे विचरता हुआ शरीरको
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धारण करता है और उसमें क्रियाशक्तिका संचार करता है। अब अगले
सूत्रमें इसके स्वरूपका प्रतिपादन करके इस प्रकरणको समाप्त करते हैं—
अणुश्च ॥ २ । ४ । १३ ॥
अणुः=यह सूक्ष्म; च=भी है।
व्याख्या—यह प्राणतत्त्व अपनी पाँच वृत्तियोंके द्वारा स्थूलरूपमें उपलब्ध
होता है; इसके सिवा, यह अणु अर्थात् सूक्ष्म भी है। यहाँ अणु कहनेसे यह
भाव नहीं समझना चाहिये कि यह छोटे आकारवाला है; इसकी सूक्ष्मताको
लक्षित करानेके लिये इसे अणु कहा गया है। सूक्ष्म होनेके साथ ही यह
परिच्छिन्न तत्त्व है। सूक्ष्मताके कारण व्यापक होनेपर भी सीमित है। ये सब
बातें भी प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नके उत्तरमें आ गयी हैं।
सम्बन्ध—छान्दोग्य-श्रुतिमें जहाँ तेज प्रभृति तीन तत्त्वोंसे जगत्की उत्पत्तिका
वर्णन किया गया है, वहाँ उन तीनोंका अधिष्ठाता देवता किसको बताया
गया है? यह निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॥ २ । ४ । १४ ॥
ज्योतिराद्यधिष्ठानम् = ज्योति आदि तत्त्व जिसके अधिष्ठान बताये गये
हैं, वह; तु=तो ब्रह्म ही है; तदामननात् = क्योंकि दूसरी जगह भी श्रुतिके द्वारा
उसीको अधिष्ठाता बताया गया है।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि उस जगत्कर्ता परमदेवने विचार
किया कि 'मैं बहुत होऊँ, तब उसने तेजकी रचना की, फिर तेजने विचार
किया।' इत्यादि (छा० उ० ६।२।३-४) इस वर्णनमें जो तेज आदि
तत्त्वमें विचार करनेवाला उनका अधिष्ठाता बताया गया है, वह परमात्मा
ही है; क्योंकि तैत्तिरीयोपनिषद्में कहा है कि 'इस जगत्की रचना करके
उसने उसमें जीवात्माके साथ-साथ प्रवेश किया।' (तै० उ० २।६)
इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमेश्वरने ही उन तत्त्वोंमें अधिष्ठातारूपसे
प्रविष्ट होकर विचार किया, स्वतन्त्र जड तत्त्वोंने नहीं।
सम्बन्ध—अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि वह परब्रह्म परमेश्वर