वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र ९-१० ] अध्याय ३ २७१
हैं, वे यहाँसे स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ कर्मोंका फल भोगकर बचे हुए
कर्मोंके अनुसार अच्छे जन्म, कुल, रूप आदिको प्राप्त होते हैं।' (गौतमस्मृति
११।१) इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात सिद्ध होती है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण
करते हैं—
चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॥ ३ । १ । ९ ॥
चेत् = यदि ऐसा कहो कि; चरणात् = चरण शब्दका प्रयोग है, इसलिये
(यह कहना उचित नहीं है कि वह शेष कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर आता है);
इति न = तो ऐसी बात नहीं है; उपलक्षणार्था = क्योंकि वह कथन अनुशय (शेष
कर्म-संस्कारों)-का उपलक्षण करनेके लिये है; इति = यह बात; कार्ष्णाजिनिः =
'कार्ष्णाजिनि' नामक आचार्य कहते हैं (इसलिये कोई विरोध नहीं है)।
व्याख्या—उपर्युक्त शंकाका उत्तर अपनी ओरसे न देकर आचार्य
कार्ष्णाजिनिका मत उपस्थित करते हुए सूत्रकार कहते हैं—यदि पूर्वपक्षीद्वारा
यह कहा जाय कि “यहाँ 'रमणीयचरणाः' इत्यादि श्रुतिमें तो चरण शब्दका प्रयोग
है, जो कर्मसंस्कारका वाचक नहीं है; इसलिये यह सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा
स्वर्गलोकसे लौटते समय बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए लौटता
है'' तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ जो 'चरण' शब्द है, वह अनुशयका
उपलक्षण करानेके लिये है अर्थात् यह सूचित करनेके लिये ही है कि जीवात्मा
भुक्तशेष कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर लौटता है, अतः कोई दोष नहीं है।
सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनमें पुनः शंका उपस्थित करके उसका निराकरण
करते हैं—
आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥ ३ । १ । १० ॥
चेत् = यदि कहो; आनर्थक्यम् = (बिना किसी कारणके उपलक्षणके
रूपमें 'चरण' शब्दका प्रयोग करना) निरर्थक है; इति न = तो यह ठीक
नहीं; तदपेक्षत्वात् = क्योंकि कर्माशयमें आचरण आवश्यक है।