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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

हुए दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं—

Page 181Permalink

१७८ वेदान्त-दर्शन [पाद २
परमाणुवादका खण्डन करनेके लिये उनकी मान्यताको असंगत बताते
हुए दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं—
महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ॥ २।२।११॥
ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् = ह्रस्व (द्व्यणुक) तथा परिमण्डल (परमाणु)-
से; महद्दीर्घवत् = महत् एवं दीर्घ (त्र्यणुक)-की उत्पत्ति बतानेकी भाँति; वा=
ही (वैशेषिकोंके द्वारा प्रतिपादित सभी बातें असमंजस—असंगत) हैं।
व्याख्या—परमाणुकारणवादी वैशेषिकोंकी मानी हुई प्रक्रिया इस प्रकार
है—एक द्रव्य सजातीय दूसरे द्रव्यको और एक गुण सजातीय दूसरे गुणको
उत्पन्न करता है। समवायी, असमवायी और निमित्त—तीनों कारणोंसे कार्यकी
उत्पत्ति होती है। जैसे वस्त्रकी उत्पत्तिमें तन्तु (सूत) तो समवायिकारण है,
तन्तुओंका परस्पर संयोग असमवायिकारण है और तुरी, वेमा तथा वस्त्र
बुननेवाला कारीगर आदि निमित्तकारण हैं। परमाणुके चार भेद हैं—पार्थिव
परमाणु, जलीय परमाणु, तैजस परमाणु तथा वायवीय परमाणु। ये परमाणु
नित्य, निरवयव तथा रूपादि गुणोंसे युक्त हैं। इनका जो परिमाण (माप) है,
उसे पारिमाण्डल्य कहते हैं। प्रलयकालमें ये परमाणु कोई भी कार्य आरम्भ
न करके यों ही स्थित रहते हैं। सृष्टिकालमें कार्यसिद्धिके लिये परमाणु तो
समवायिकारण बनते हैं, उनका एक-दूसरेसे संयोग असमवायिकारण होता
है, अदृष्ट या ईश्वरकी इच्छा आदि उसमें निमित्तकारण बनते हैं। उस समय
भगवान्‌की इच्छासे पहला कर्म वायवीय परमाणुओंमें प्रकट होता है, फिर
एक दूसरेका संयोग होता है। दो परमाणु संयुक्त होकर एक द्व्यणुकरूप
कार्यको उत्पन्न करते हैं। तीन द्व्यणुकोंसे त्र्यणुक उत्पन्न होता है। चार त्र्यणुकोंसे
चतुरणुककी उत्पत्ति होती है। इस क्रमसे महान् वायुतत्त्व प्रकट होता है और
वह आकाशमें वेगसे बहने लगता है। इसी प्रकार तैजस परमाणुओंसे अग्निकी
उत्पत्ति होती है और वह प्रज्वलित होने लगता है। जलीय परमाणुओंसे
जलका महासागर प्रकट होकर उत्ताल तरंगोंसे युक्त दिखायी देता है तथा इसी