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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
एवं क्षेत्रभागकी अभिलाषा करती है, उसी-उसीको पाकर सुखपूर्वक जीवन
धारण करती है।' इस मन्त्रके अनुसार 'देहकी जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं
होता और इसके वधसे इसका नाश नहीं होता'—इस कथनसे जीवात्माको
लक्ष्य करानेवाला संकेत मिलता है; क्योंकि इसके आगेवाले मन्त्रमें कर्मफलकी
अनित्यता बतायी गयी है और कर्मफल-भोगका सम्बन्ध जीवात्मासे ही है।
इस प्रकार जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत होनेके कारण वहाँ 'दहर'
नामसे 'जीवात्मा' का ही प्रतिपादन है, ऐसा कहा जाय तो यह ठीक नहीं है;
क्योंकि पूर्वोक्त मन्त्रमें ही जो 'सत्यसंकल्प' आदि लक्षण बताये गये हैं,
उनका जीवात्मामें होना सम्भव नहीं है। इसलिये यहाँ 'दहर' शब्दसे परब्रह्म
परमात्माका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना सर्वथा उचित है।
सम्बन्ध—पूर्वोक्त मतकी ही पुष्टिके लिये पुनः शंका उठाकर उसका
समाधान करते हैं—
उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १ । ३ । १९ ॥
चेत्=यदि कहो; उत्तरात्=उसके बादवाले वर्णनसे भी 'दहर'
शब्द जीवात्माका ही बोधक सिद्ध होता है; तु=तो यह कथन ठीक
नहीं है, (क्योंकि) आविर्भूतस्वरूपः=उस मन्त्रमें जिसका वर्णन है,
वह अपने शुद्धस्वरूपको प्राप्त हुआ आत्मा है।
व्याख्या—''छान्दोग्योपनिषद् (८।३।४)-में कहा है कि 'अथ
य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन
रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य
ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यम् ॥' अर्थात् 'यह जो सम्प्रसाद है,
वह इस शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने शुद्धस्वरूपसे
सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा है, यह अमृत एवं अभय है और
यही ब्रह्म है—ऐसा आचार्यने कहा। उस इस ब्रह्मका नाम सत्य है।'
इस मन्त्रमें 'सम्प्रसाद' के नामसे स्पष्ट ही जीवात्माका वर्णन है और
उसके लिये भी वे ही अमृत, अभय आदि विशेषण दिये गये हैं,

सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ ९१
जो अन्यत्र ब्रह्मके लिये आते हैं, इसलिये इन लक्षणोंका जीवात्मामें
होना असम्भव नहीं है, अतएव 'दहर' शब्दको 'जीवात्मा' का वाचक
माननेमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये।'' ऐसी शंका उठायी जाय
तो ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त मन्त्रमें अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए
जीवात्माके लिये वैसे विशेषण आये हैं। इसलिये उसके आधारपर
'दहर' शब्दको जीवात्माका वाचक नहीं माना जा सकता।
सम्बन्ध— यदि ऐसी बात है, तो उक्त प्रकरणमें जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले
शब्दोंका प्रयोग क्यों किया गया है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
अन्यार्थश्च परामर्शः॥ १। ३। २०॥
परामर्शः= (उक्त प्रकरणमें) जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत,
च=भी; अन्यार्थः=दूसरे ही प्रयोजनके लिये है।
व्याख्या— पूर्वोक्त प्रकरणमें जो जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले
शब्दोंका प्रयोग हुआ है, वह 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण करानेके
लिये नहीं, अपितु दूसरे ही प्रयोजनसे है। अर्थात् उस दहर शब्दवाच्य
परमात्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर जीवात्मा भी वैसे ही
गुणोंवाला बन जाता है, यह भाव प्रदर्शित करनेके लिये ही वहाँ
जीवात्माका उस रूपमें वर्णन है। परब्रह्मका ज्ञान हो जानेपर बहुत-
से दिव्य गुण जीवात्मामें आ जाते हैं, यह बात भगवद्गीतामें भी कही
गयी है (१४।२)। इसलिये उक्त प्रकरणमें जीवात्माका वर्णन आ
जानेमात्रसे यह नहीं सिद्ध होता कि वहाँ 'दहर' शब्द जीवात्माका
वाचक है।
सम्बन्ध—इसी बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार पुनः शंका उठाकर
उसका समाधान करते हैं—
अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ॥ १। ३। २१ ॥
चेत्=यदि कहो; अल्पश्रुतेः = श्रुतिमें 'दहर' को बहुत छोटा बताया गया