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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

४१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

४१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
सम्बन्ध— अब कर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिके विषयमें कहते हैं—
आदित्यादिमतयश्चांग उपपत्तेः॥ ४। १। ६॥
च=तथा; अंगे=कर्मांगभूत उद्गीथ आदिमें; आदित्यादिमतयः=आदित्य
आदिकी बुद्धि करनी चाहिये; उपपत्तेः=क्योंकि यही युक्तियुक्त है,
ऐसा करनेसे कर्मसमृद्धिरूप फलकी सिद्धि होती है।
व्याख्या—कर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिमें जो आदित्य आदिकी
भावनापूर्वक उपासना करनेका विधान किया गया है (छा० उ०
१। ३। १ तथा २। २। १) वह अवश्य कर्तव्य है; क्योंकि ऐसा
करनेसे कर्मसमृद्धिरूप फलकी सिद्धि होती है। आत्मभाव करनेका
ऐसा कोई फल नहीं दिखायी देता। इसलिये यही सिद्ध होता है
कि कनिष्ठ वस्तुमें श्रेष्ठकी भावनाका नाम प्रतीक-उपासना है।
सम्बन्ध—यह जिज्ञासा होती है कि साधकको किसी आसनपर
बैठकर उपासना करनी चाहिये या चलते-फिरते प्रत्येक परिस्थितिमें
वह उपासना कर सकता है? इसपर कहते हैं—
आसीनः सम्भवात् ॥ ४। १। ७॥
आसीनः=बैठे हुए ही (उपासना करनी चाहिये); सम्भवात्=क्योंकि
बैठकर ही निर्विघ्न उपासना करना सम्भव है।
व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरका जैसा रूप सुनने और विचार करनेपर
समझमें आया है, उसका बार-बार तैलधाराकी भाँति निरन्तर चिन्तन करते
रहनेका नाम उपासना है। यह उपासना चलते-फिरते या अन्य शरीर-
सम्बन्धी काम करते समय नहीं हो सकती, क्योंकि उस समय चित्त
विक्षिप्त रहता है। तथा सोते हुए करनेमें भी निद्रारूप विघ्नका आना
स्वाभाविक है; अतः केवल बैठकर करनेसे ही निर्विघ्न उपासना हो
सकती है। इसलिये उपासनाका अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये। भगवान्
श्रीकृष्णने भी कहा है कि 'उपविश्यासने युञ्ज्याद् योगमात्मविशुद्धये ॥'

सूत्र ८-९ ] अध्याय ४ ४१५
अर्थात् 'आसनपर बैठकर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास
करे' (गीता ६। १२)।
सम्बन्ध — उसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु उपस्थित
करते हैं—
ध्यानाच्च ॥ ४ । १ । ८ ॥
ध्यानात् = उपासनाका स्वरूप ध्यान है, इसलिये; च = भी (यही
सिद्ध होता है कि बैठकर उपासना करनी चाहिये) ।
व्याख्या — अपने इष्टदेवका ध्यान ही उपासनाका स्वरूप है (मु० उ०
३। १। ८) और चित्तकी एकाग्रताका नाम ध्यान है। अतएव यह बैठकर
ही किया जा सकता है; चलते-फिरते या सोकर नहीं किया जा सकता।
सम्बन्ध — पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं—
अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ४।१।९॥
च=तथा श्रुतिमें; अचलत्वम्=शरीरकी निश्चलताको; अपेक्ष्य=आवश्यक
बताकर ध्यान करनेका उपदेश किया गया है।
व्याख्या — श्रुतिमें कहा है कि—
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य ।
ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥
'ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये ध्यानका अभ्यास करनेवालेको चाहिये कि
सिर, ग्रीवा और छाती—इन तीनोंको उठाये हुए, शरीरको सीधा और
स्थिर करके समस्त इन्द्रियोंको मनके द्वारा हृदयमें निरुद्ध करके
ॐकाररूप नौकाद्वारा समस्त भयदायक जन्मान्तररूप स्रोतोंसे तर जाय'
(श्वेता० उ० २।८)। इस श्रुतिसे यह स्पष्ट हो जाता है कि
उपासनाके लिये शरीरकी भी अचलता आवश्यक है, इसलिये भी
उपासना बैठकर ही की जानी चाहिये।
सम्बन्ध — उस बातको स्मृतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं—