वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र १७] अध्याय ४ ४६१
सूत्र १७] अध्याय ४ ४६१
भी प्राणियोंकी स्थिति सुषुप्तिकी भाँति ही रहती है, इसलिये उसका पृथक्
उल्लेख सूत्रमें नहीं किया, यही अनुमान होता है)। अथवा परब्रह्मकी प्राप्ति
अर्थात् सायुज्य मुक्तिको लेकर वैसा कहा गया है (मु० उ० ३।२।८; बृह०
उ० २।४।१२)। भाव यह कि लय-अवस्था और सायुज्य मुक्ति इन
दोनोंमेंसे किसी एकके उद्देश्यसे वैसा कथन है; क्योंकि ब्रह्मलोकोंमें जानेवाले
अधिकारियोंके लिये तो स्पष्ट शब्दोंमें वहाँके दिव्य भोगोंके उपभोगकी,
अनेक शरीर धारण करनेकी तथा यथेच्छ लोकोंमें विचरण करनेकी बात
श्रुतिमें उन-उन स्थलोंमें कही गयी है। इसलिये किसी प्रकारका विरोध या
असम्भव बात नहीं है।
सम्बन्ध — यदि ब्रह्मलोकमें गये हुए मुक्त आत्माओंमें इस प्रकार अपने
अनेक शरीर रचकर भोगोंका उपभोग करनेकी सामर्थ्य है, तब तो उनमें
परमेश्वरकी भाँति जगत्की रचना आदि कार्य करनेकी भी सामर्थ्य हो जाती
होगी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ॥४।४।१७॥
जगद्व्यापारवर्जम् = जगत्की रचना आदि व्यापारको छोड़कर और बातोंमें
ही उनकी सामर्थ्य है; प्रकरणात् = क्योंकि प्रकरणसे यही सिद्ध होता है;
च = तथा; असन्निहितत्वात् = जगत्की रचना आदि व्यापारसे इनका कोई
निकट सम्बन्ध नहीं दिखाया गया है (इसलिये भी वही बात सिद्ध होती है)।
व्याख्या — जहाँ-जहाँ इस जड-चेतनात्मक समस्त जगत्की उत्पत्ति,
संचालन और प्रलयका प्रकरण श्रुतियोंमें आया है (तै० उ० ३।१; छा०
उ० ६।२।१—३; ऐ० उ० १।१; बृह० उ० ३।७।३ से २३ तक;
शतपथ० १४।३।५।७ से ३१ तक); वहाँ सभी जगह यह कार्य उस
परब्रह्म परमात्माका ही बताया गया है। ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले
मुक्तात्माओंका सृष्टिरचनादि कार्यसे सम्बन्ध कहीं नहीं बताया गया है।
इन दोनों कारणोंसे यही बात सिद्ध होती है कि इस जड-चेतनात्मक
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समस्त जगत्की रचना, उसका संचालन और प्रलय आदि जितने भी कार्य
हैं, उनमें उन मुक्तात्माओंका कोई हाथ या सामर्थ्य नहीं है; वे केवल
वहाँके दिव्य भोगोंका उपभोग करनेकी ही यथेष्ट सामर्थ्य रखते हैं।
सम्बन्ध — इसपर पूर्वपक्ष उठाकर उसके समाधानपूर्वक पूर्व सूत्रमें
कहे हुए सिद्धान्तको पुष्ट करते हैं—
प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डल-
स्थोक्तेः ॥ ४ । ४ । १८ ॥
चेत् = यदि कहो कि; प्रत्यक्षोपदेशात् = वहाँ प्रत्यक्षरूपसे इच्छानुसार
लोकोंमें विचरनेका उपदेश है, अर्थात् वहाँ जाकर इच्छानुसार कार्य
करनेका अधिकार बताया गया है; इति न = तो यह बात नहीं है;
आधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः = क्योंकि वह कहना अधिकारियोंके लोकोंमें
स्थित भोगोंका उपभोग करनेके लिये ही है।
व्याख्या — यदि कोई ऐसी शंका करे कि 'वह स्वराट् हो जाता
है, उसकी समस्त लोकोंमें इच्छानुसार गमन करनेकी शक्ति हो जाती
है।' (छा० उ० ७।२५।२) 'वह स्वराज्यको प्राप्त हो जाता है।'
(तै० उ० १।६।२) इत्यादि श्रुतिवाक्योंमें उसे स्पष्ट शब्दोंमें स्वराट्
और स्वराज्यको प्राप्त बताया है तथा इच्छानुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें
विचरनेकी सामर्थ्यसे सम्पन्न कहा गया है, इससे उसका जगत्की
रचना आदिके कार्यमें अधिकार है, यह स्वतः सिद्ध हो जाता है, तो
ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ यह भी कहा है कि 'वह सबके मनके
स्वामीको प्राप्त हो जाता है' (तै० उ० १।६।२)। अतः उसकी सब
सामर्थ्य उस ब्रह्मलोककी प्राप्तिके प्रभावसे है और ब्रह्माके अधीन है,
इसलिये जगत्के कार्यमें हस्तक्षेप करनेकी उसमें शक्ति नहीं है। उसे
जो शक्ति और अधिकार दिये गये हैं, वे केवल उन-उन अधिकारियोंके
लोकोंमें स्थित भोगोंका उपभोग करनेकी स्वतन्त्रताके लिये ही हैं।
अतः वह कथन वहींके लिये है—