वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
३७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । ८ ॥
तु=किंतु; अधिकोपदेशात्=श्रुतिमें कर्मोंकी अपेक्षा अधिक ब्रह्मविद्याके
माहात्म्यका कथन होनेके कारण; बादरायणस्य=व्यासजीका मत; एवम्=जैसा
प्रथम सूत्रमें कहा था वैसा ही है; तद्दर्शनात्=क्योंकि श्रुतिमें विद्याकी अधिकता
वैसी दिखलायी गयी है।
व्याख्या—जैमिनिने जो विद्याको कर्मका अंग बताया है, वह ठीक
नहीं है। उन्होंने अपने कथनकी सिद्धिके लिये जो युक्तियाँ दी हैं, वे भी
आभासमात्र ही हैं। अतः बादरायणने पूर्वसूत्रमें जो अपना मत प्रकट किया
है, वह अब भी ज्यों-का-त्यों है। जैमिनिकी युक्तियोंसे उसमें कोई
परिवर्तन नहीं हुआ है। यद्यपि ब्रह्मज्ञानके साथ-साथ लोकसंग्रहके लिये
या प्रारब्धानुसार शरीर-स्थितिके निमित्त किये जानेवाले कर्म रहें, तो उनसे
कोई हानि नहीं है; तथापि परमात्माकी प्राप्तिरूप पुरुषार्थका कारण तो
एकमात्र परमात्माका तत्त्वज्ञान ही है। इसके सिवा, न तो कर्म-ज्ञानका
समुच्चय परमपुरुषार्थका साधन है और न केवल कर्म ही; क्योंकि श्रुतिमें
कहा है—
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥
‘इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही श्रेष्ठ माननेवाले मूर्खलोग उससे भिन्न
वास्तविक श्रेयको नहीं जानते। वे शुभ कर्मोंके फलरूप स्वर्गलोकके उच्चतम
स्थानमें वहाँके भोगोंका अनुभव करके इस मनुष्यलोकमें या इससे भी
अत्यन्त नीचेके लोकमें गिरते हैं।’ (मु० उ० १ । २ । १०)
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥
‘इस प्रकार कर्मसे प्राप्त होनेवाले लोकोंकी परीक्षा करके अर्थात्
उनकी अनित्यताको समझकर द्विजको उनसे सर्वथा विरक्त हो जाना
चाहिये तथा यह निश्चय करना चाहिये कि वह अकृत अर्थात् स्वतःसिद्ध
सूत्र ९ ] अध्याय ३ ३७५
परमात्मा कर्मोंके द्वारा नहीं मिल सकता। अतः जिज्ञासु पुरुष उस
ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ गुरुके समीप हाथमें समिधा
लिये हुए जाय।' (मु० उ० १।२।१२) 'इस तरह अपनी शरणमें आये
हुए शिष्यको ब्रह्मज्ञानी महात्मा ब्रह्मविद्याका उपदेश करे।' (मु० उ० १।
२।१३) यह सब कहकर श्रुतिने वहाँ ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन किया
है और उसे ज्ञानके द्वारा प्राप्त होनेयोग्य बतलाकर (मु० उ० २।२।७)
कहा है कि 'कार्य-कारणस्वरूप उस ब्रह्मको जान लेनेपर इस मनुष्यके
हृदयकी चिज्जड-ग्रन्थिका भेदन हो जाता है, सब संशय नष्ट हो जाते
हैं और समस्त कर्मोंका क्षय हो जाता है।' (मु० उ० २।२।८)* इस
प्रकार श्रुतियोंमें जगह-जगह कर्मोंकी अपेक्षा ब्रह्मज्ञानका महत्त्व बहुत
अधिक बताया गया है। इसलिये ब्रह्मविद्या कर्मोंका अंग नहीं है।
सम्बन्ध—श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार देखनेसे जो विद्याको कर्मका अंग
बताया गया था, उसका उत्तर देते हैं—
तुल्यं तु दर्शनम् ॥ ३।४।९॥
दर्शनम्=आचारका दर्शन; तु=तो; तुल्यम्=समान है (अतः उससे
विद्या कर्मका अंग है, यह नहीं सिद्ध होता)।
व्याख्या—आचारसे भी यह सिद्ध नहीं होता कि विद्या कर्मका अंग है,
क्योंकि श्रुतिमें दोनों प्रकारका आचार देखा जाता है। एक ओर ज्ञाननिष्ठ
जनकादि गृहस्थ महापुरुष लोकसंग्रहके लिये यज्ञ-यागादि कर्म करते देखे
जाते हैं तो दूसरी ओर केवल भिक्षासे निर्वाह करनेवाले विरक्त संन्यासी
महात्मा लोकसंग्रहके लिये ही समस्त कर्मोंका त्याग करके ज्ञाननिष्ठ हो केवल
ब्रह्मचिन्तनमें रत रहते हैं। इस प्रकार आचार तो दोनों ही तरहके उपलब्ध होते
हैं। इससे कर्मकी प्रधानता नहीं सिद्ध होती है। जिनको वास्तवमें ज्ञान प्राप्त
- भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे॥