वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
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खा लेता है, वह उसी प्रकार पापसे लिप्त नहीं होता जैसे कीचड़से
आकाश' (मनु० १०।१०४)। इस प्रकार जो स्मृति-वचन उपलब्ध
होते हैं, उनसे भी यही सिद्ध होता है कि प्राण जानेकी परिस्थिति
उत्पन्न न होनेतक आहार-शुद्धिसम्बन्धी सदाचारका परित्याग नहीं
करना चाहिये।
सम्बन्ध—अब श्रुति-प्रमाणसे भी अभक्ष्य-भक्षणका निषेध सिद्ध
करते हैं—
शब्दश्चातोऽकामकारे ॥ ३ । ४ । ३१ ॥
अकामकारे = इच्छानुसार अभक्ष्यभोजनके निषेधमें; शब्दः = श्रुतिप्रमाण;
च = भी है; अतः = इसलिये (प्राणसंकटकी स्थिति आये बिना निषिद्ध
अन्न-जलका ग्रहण नहीं करना चाहिये)।
व्याख्या—इच्छानुसार अभक्ष्य-भक्षणका निषेध करनेवाली श्रुति भी
है, * इसलिये यह सिद्ध हुआ कि जहाँ-कहीं श्रुतिमें ज्ञानकी विशेषता
दिखलानेके लिये विद्वान्के सम्बन्धमें यह कहा है कि 'उसके लिये कुछ
भी अभक्ष्य नहीं होता', वह केवल विद्याकी स्तुतिके लिये है। सिद्धान्त
यही है कि जबतक प्राण जानेकी परिस्थिति न पैदा हो जाय, तबतक
अभक्ष्य-त्यागसम्बन्धी सदाचारका त्याग नहीं करना चाहिये।
सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर
भी अभक्ष्य-त्याग आदिके आचारका पालन करना चाहिये। अब यह जिज्ञासा
होती है कि ज्ञानीको कर्म करना चाहिये या नहीं? यदि करना चाहिये तो
कौन-से कर्म करने चाहिये? अतः इसके निर्णयके लिये कहते हैं—
- स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबँश्च गुरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः
पञ्चमश्चाचरँस्तैरिति ॥ (छा० उ० ५।१०।९)
'सुवर्ण चुरानेवाला, शराबी, गुरुपत्नीगामी तथा ब्रह्महत्यारा—ये चारों पतित होते हैं
और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग रखनेवाला भी पतित होता है।' सुरा (मद्य) अभक्ष्य है। यहाँ
इसे पीनेवालेको महापातकी बताकर उसके पानका निषेध किया गया है।
सूत्र ३२-३३ ] अध्याय ३ ३९३
विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि ॥ ३।४।३२॥
च=तथा; विहितत्वात्=शास्त्रविहित होनेके कारण; आश्रमकर्म=आश्रम-
सम्बन्धी कर्मोंका; अपि=भी (अनुष्ठान करना चाहिये)।
व्याख्या—ज्ञानीके द्वारा भी जिस प्रकार शरीर स्थितिके लिये
उपयोगी भोजनादि कर्म तथा ब्रह्मविद्योपयोगी शम-दमादि कर्म लोकसंग्रहके
लिये कर्तव्य हैं, उसी प्रकार जिस आश्रममें वह रहता हो, उस आश्रमके
कर्म भी उसके लिये विहित हैं (बृह० उ० ४।४।२२)।* अतः उनका
अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये; इसीलिये भगवान्ने भी कहा है—
‘हे अर्जुन! जैसे अज्ञानी मनुष्य कर्मोंमें आसक्त होकर उनका अनुष्ठान
करता है वैसे ही ज्ञानी भी लोकसंग्रहको चाहता हुआ बिना आसक्तिके
उनका अनुष्ठान करे। (गीता ३।२५)
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ़ करते हैं—
सहकारित्वेन च॥ ३।४।३३॥
सहकारित्वेन=साधनमें सहायक होनेके कारण; च=भी (उनका
अनुष्ठान लोकसंग्रहके लिये करना चाहिये)।
व्याख्या—जिस प्रकार शम, दम, तितिक्षादि कर्म परमात्माकी
प्राप्तिके साधनमें सहायक हैं, उसी प्रकार निष्कामभावसे किये
जानेवाले शास्त्रविहित आश्रमसम्बन्धी आचार, व्यवहार आदि भी
सहायक हैं। इसलिये उनका अनुष्ठान भी लोकसंग्रहके लिये अवश्य
करना चाहिये, त्याग नहीं करना चाहिये।
सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ब्रह्मविद्याका अभ्यास
करनेवाले साधकोंके लिये निष्कामभावसे और परमात्माको प्राप्त हुए महात्माओंके
लिये लोकसंग्रहार्थ आश्रम-सम्बन्धी विहित कर्मोंका अनुष्ठान तथा खान-
पानसम्बन्धी सदाचारका पालन आवश्यक है। अब परब्रह्म पुरुषोत्तमकी
- तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन।