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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
सम्बन्ध—इसी विषयमें आचार्य जैमिनिका मत बताते हैं—
सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥ १।२।३१॥
सम्पत्तेः = परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है, इसलिये (उसे
देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमें कोई विरोध नहीं है); इति = ऐसा;
जैमिनिः = जैमिनि आचार्य मानते हैं; हि = क्योंकि; तथा = ऐसा ही भाव; दर्शयति =
दूसरी श्रुति भी प्रकट करती है।
व्याख्या—आचार्य जैमिनिका यह कथन है कि परब्रह्म परमेश्वर अनन्त
ऐश्वर्यसे सम्पन्न है; अतः उस निर्विकार, निराकार, देशकालातीत परमात्माको
सगुण साकार और किसी देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमें कोई
विरोध नहीं है; क्योंकि दूसरी श्रुति भी ऐसा ही भाव प्रकट करती है। (मु०
उ० २।१।४)१
सम्बन्ध—अब सूत्रकार अपने मतका वर्णन करते हुए इस पादका
उपसंहार करते हैं—
आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥ १।२।३२॥
अस्मिन् = इस वैदिक सिद्धान्तमें; एनम् = इस परमेश्वरको; (एवम्)=
ऐसा; च = ही; आमनन्ति = प्रतिपादन करते हैं।
व्याख्या—इस वैदिक सिद्धान्तमें सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके
निवासस्थान, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन
करते हैं२ इस विषयमें शास्त्र ही प्रमाण है। युक्ति-प्रमाण यहाँ नहीं चल
१-यह मन्त्र पृष्ठ ६६ के अन्तर्गत २३ वें सूत्रकी व्याख्यामें अर्थसहित आ गया है।
२-अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥
(श्वेता० ५। १३)
'दुर्गम संसारके भीतर व्याप्त, आदि-अन्तसे रहित, समस्त जगत्की रचना करनेवाले,