वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
दर्शयति च॥ ३।३।२२॥
दर्शयति च=श्रुति यही बात दिखलाती भी है।
व्याख्या—जहाँ इस प्रकार स्थान और नामका भेद हो, वहाँ एक जगह
कहे हुए गुण दूसरी जगह नहीं लिये जाते; यह बात श्रुतिद्वारा इस प्रकार
दिखलायी गयी है। छान्दोग्योपनिषद्में आधिदैविक सामके प्रसंगमें सूर्यस्थ
पुरुषका वर्णन करके फिर आध्यात्मिक सामके प्रसंगमें आँखमें स्थित पुरुषका
वर्णन किया गया है और वहाँ सूर्यस्थ पुरुषके नाम-रूप आदिका आँखमें
स्थित पुरुषमें भी श्रुतिने स्वयं विधान करके दोनोंकी एकता की है
(छा० उ० १।७।५)। इससे यह सूचित होता है कि ऐसे स्थलोंमें विद्याकी
एकता मानकर एकके गुणोंका अन्यत्र उपसंहार साधारण नियम नहीं है; जहाँ
विद्याकी एकता मानकर गुणोंका उपसंहार करना अभीष्ट होता है उस
प्रसंगमें श्रुति स्वयं उसका विधान कर देती है जैसे कि उपर्युक्त प्रसंगमें
सूर्यमें स्थित पुरुषके गुणोंका नेत्रवर्ती पुरुषमें विधान किया है।
सम्बन्ध—नेत्रवर्ती तथा सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोंमें ब्रह्मके किन-
किन गुणोंका उपसंहार (अध्याहार) नहीं किया जा सकता ? इसका निर्णय
ग्रन्थकार दो सूत्रोंद्वारा करते हैं—
सम्भृतिद्युव्याप्त्यपि चातः॥ ३।३।२३॥
च=तथा; अतः =इसलिये अर्थात् विद्याकी एकता न होनेके कारण ही;
सम्भृतिद्युव्याप्ती = समस्त लोकोंको धारण करना तथा द्युलोक आदि
अखिल ब्रह्माण्डको व्याप्त करके स्थित होना—ये दोनों ब्रह्मसम्बन्धी गुण;
अपि = भी अन्यत्र (नेत्रान्तर्वर्ती आदि पुरुषोंमें) नहीं लेने चाहिये।
व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् (३।८।३)-में गार्गी और याज्ञवल्क्यके
संवादका वर्णन आता है। वहाँ गार्गीने याज्ञवल्क्यसे पूछा है—'जो द्युलोकसे
ऊपर है, जो पृथ्वीसे नीचे है और जो द्युलोक एवं पृथ्वीके मध्यमें है तथा
स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं। इनके सिवा जिसे भूत, वर्तमान
और भविष्य कहते हैं; वह सब किसमें ओतप्रोत है?' इसके उत्तरमें
याज्ञवल्क्यने कहा—'द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीसे नीचेतक यह सब कुछ
आकाशमें ओतप्रोत है।' (३।८।४) गार्गीने पूछा—'आकाश किसमें ओतप्रोत
है?' (३।८।७)। याज्ञवल्क्य बोले—'गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता
पुरुष अक्षर कहते हैं; वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न
लाल है, न चिकना है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न संग
है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है,
न प्राण है, न मुख है, न माप है, न भीतर है, न बाहर है, वह कुछ भी नहीं
खाता, उसे कोई भी नहीं खाता।' (३।८।८) इस प्रकार अक्षरब्रह्मके स्वरूपका
वर्णन करके याज्ञवल्क्यने यह भी बताया कि 'ये सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक और
पृथिवी आदि इसीके शासनमें हैं, इसीने इन सबको धारण कर रखा है।'
(३।८।९)। इस प्रसंगमें अक्षरब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए दो
बातें मुख्यरूपसे बतायी गयी हैं, एक तो वह द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीके
नीचेतक समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त है और दूसरी बात यह है कि वही सबको धारण
करनेवाला है। इन दोनों गुणोंका नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोंमें
अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रतीक-उपासनाके लिये सीमित स्थानोंमें
स्थित कहे हुए पुरुष न तो सर्वव्यापक हो सकते हैं और न सबको धारण ही
कर सकते हैं। इसी प्रकार अन्यत्र भी, जहाँ पूर्ण ब्रह्मका वर्णन नहीं है, उन
प्रतीकोंमें इन गुणोंका उपसंहार नहीं हो सकता; यह भलीभाँति समझ लेना चाहिये।
सम्बन्ध—'उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके गुणोंका उपसंहार न हो, यह तो ठीक
है, परन्तु पुरुषविद्यामें जो पुरुषके गुण बताये गये हैं, उनका उपसंहार तो
अन्यत्र जहाँ-जहाँ पुरुषोंका वर्णन हो, उन सबमें होना ही चाहिये।' ऐसी
आशंका होनेपर कहते हैं—
पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥ ३। ३। २४॥
पुरुषविद्यायाम् इव=पुरुषविद्यामें जो गुण बताये गये हैं, वैसे गुण;
च=भी; इतरेषाम्=अन्य पुरुषोंके नहीं हो सकते; अनाम्नानात्=क्योंकि श्रुतिमें
उनके ऐसे गुण कहीं नहीं बताये गये हैं।
व्याख्या - मुण्डकोपनिषद्में (२।१।२ से १० तक) अक्षरब्रह्मका
पुरुषके नामसे वर्णन किया गया है। वहाँ पहले अक्षरब्रह्मसे सबकी उत्पत्ति
और उन्हींमें सबका लय (२।१।१) बताकर उसे दिव्य अमूर्त पुरुष
कहा गया है (२।१।२)। फिर २।१।३ से लेकर २।१।९ तक उसीसे
समस्त प्राण, इन्द्रिय, पंचभूत, सूर्य, चन्द्रमा, वेद, अग्नि, देवता, मनुष्य,
अन्न, समुद्र तथा पर्वत आदिकी सृष्टि बतायी गयी है। तदनन्तर २।१।
१० वें मन्त्रमें उस पुरुषकी महिमाका इस प्रकार वर्णन किया गया है—
'पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम्। एतद् यो वेद निहितं
गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य॥' अर्थात् 'पुरुष ही यह सब
कुछ है, वही तप, कर्म और परम अमृतस्वरूप ब्रह्म है। हे सोम्य ! हृदयरूप
गुफामें स्थित इस अन्तर्यामी परम पुरुषको जो जानता है, वह यहीं इस
मनुष्य-शरीरमें ही अविद्याजनित गाँठको छिन्न-भिन्न कर देता है।' इस
प्रकार इस पुरुषविद्याके प्रकरणमें जो पुरुषके सर्वोत्पादकत्व, परात्परत्व,
सर्वव्यापकत्व तथा अविद्यानिवारकत्व आदि दिव्य गुण बताये गये हैं,
उनका भी नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोंमें तथा जहाँ-जहाँ
स्थूल, सूक्ष्म या कारण-शरीरका वर्णन पुरुषके नामसे किया गया है, उन
पुरुषोंमें (छा० उ० ५।९।१) (तै० उ० २।१ से ७ तक) अध्याहार
नहीं किया जा सकता; क्योंकि श्रुतिमें कहीं भी उनके लिये वैसे गुणोंका
प्रतिपादन नहीं किया गया है। उन प्रकरणोंमें उन पुरुषोंके अन्तरात्मा
परमपुरुषको लक्ष्य करानेके लिये उनको पुरुष नाम दिया गया है।
सम्बन्ध—इसी प्रकार—
वेधाद्यर्थभेदात् ॥ ३। ३। २५ ॥
वेधादि=बींधने आदिका वर्णन करके जो ब्रह्मको वेधका लक्ष्य
बताया गया है, इन सबका अध्याहार भी अन्य विद्याओंमें नहीं करना
चाहिये; अर्थभेदात् = क्योंकि वहाँ प्रयोजनमें भेद है।
व्याख्या - मुण्डकोपनिषद् (२।२।३)-में कहा है कि-