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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
पृथगुपदेशात् ॥ २ । ३ । २८ ॥
पृथक् = (जीवात्माके विषयमें) अणुपरिमाणसे भिन्न; उपदेशात् = उपदेश
श्रुतिमें मिलता है, इसलिये (जीवात्मा अणु नहीं, विभु है)।
व्याख्या - पूर्वपक्षकी ओरसे जीवात्माको अणु बतानेके लिये जो
प्रमाण दिया गया, उसी श्रुतिमें स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको विभु बताया गया
है। भाव यह कि जहाँ जीवात्माका स्वरूप बालाग्रके दस हजारवें भागके
समान बताया है, वहीं उसको 'स चानन्त्याय कल्पते।' इस वाक्यसे अनन्त
अर्थात् विभु होनेमें समर्थ कहा गया है (श्वेता० उ० ५। ९)। अतः प्रमाण
देनेवालेको श्रुतिके अगले उपदेशपर भी दृष्टिपात करना चाहिये। इसके
सिवा, कठोपनिषद् (१। ३। १०, १३; २। ३। ७) -में स्पष्ट ही जीवात्माका
विशेषण 'महान्' आया है तथा गीतामें भी जीवात्माके स्वरूपका वर्णन करते
हुए स्पष्ट कहा है कि 'यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और
सनातन है' (गीता २। २४)। 'जिस प्रकार सब जगह व्याप्त हुआ भी
आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी शरीरमें सब
जगह स्थित है तो भी उससे लिप्त नहीं होता।' (गीता १३। ३२) तथा 'उस
आत्माको तू अविनाशी समझ, जिससे यह समस्त जडसमुदाय व्याप्त है।'
(गीता २। १७) - इन प्रमाणोंके विषयमें यह नहीं कहा जा सकता कि ये
परमात्माके प्रकरणमें आये हैं।
सम्बन्ध - इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यदि ऐसी बात है तो श्रुतिमें
जो स्पष्ट शब्दोंमें आत्माको अणु और अंगुष्ठमात्र कहा है, उसकी संगति
कैसे होगी? इसपर कहते हैं-
तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २ । ३ । २९ ॥
तद्व्यपदेशः = वह कथन; तु = तो; तद्गुणसारत्वात् = उस बुद्धि आदिके
गुणोंकी प्रधानताको लेकर है; प्राज्ञवत् = जैसे परमेश्वरको अणु और हृदयमें
स्थित अंगुष्ठमात्र बताया है, वैसे ही जीवात्माके लिये भी समझना चाहिये।

सूत्र २९ ] अध्याय २ २२५
व्याख्या—श्रुतिमें जीवात्माको अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला कहते हुए इस
प्रकार वर्णन किया गया है—
अंगुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकारसमन्वितो यः।
बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः॥
'जो अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला, सूर्यके सदृश प्रकाशस्वरूप तथा
संकल्प और अहंकारसे युक्त है, वह बुद्धिके गुणोंसे और शरीरके गुणोंसे
ही आरेकी नोक-जैसे सूक्ष्म आकारवाला है—ऐसा परमात्मासे भिन्न
जीवात्मा भी निःसंदेह ज्ञानियोंद्वारा देखा गया है।' (श्वेता० उ० ५।८)
जीवात्माकी गति-आगतिका वर्णन भी शरीरादिके सम्बन्धसे ही है, (कौ०
उ० ३।६; प्र० उ० ३।९, १०)¹। इससे यह बात बिलकुल स्पष्ट हो
जाती है कि श्रुतिमें जहाँ कहीं जीवात्माको एकदेशी 'अंगुष्ठमात्र' या
'अणु' कहा गया है, वह बुद्धि और शरीरके गुणोंको लेकर ही है; जैसे
परमात्माको भी जगह-जगह जीवात्माके हृदयमें स्थित (क० उ० १।३।
१; प्र० उ० ६।२; मु० उ० २।१।१० तथा २।२।१; ३।१।५, ७;
श्वेता० उ० ३।२०) तथा अंगुष्ठमात्र भी (क० उ० २।१।१२-१३)
बताया है। वह कथन स्थानकी अपेक्षासे ही है, उसी प्रकार जीवात्माके
विषयमें भी समझना चाहिये। वास्तवमें वह अणु नहीं, विभु है; इसमें कोई
शंका नहीं है।
पूर्वपक्षीने जो बृहदारण्यक और छान्दोग्य-श्रुतिका प्रमाण देकर यह बात कही
कि 'वह एक जगह स्थित रहते हुए ही नखसे लोमतक व्याप्त है', वह कहना
सर्वथा प्रकरणविरुद्ध है; क्योंकि उस प्रकरणमें आत्माके गुणकी व्याप्तिविषयक
कोई बात ही नहीं कही गयी है।² तथा गन्ध, प्रदीप आदिका दृष्टान्त
देकर जो गुणके द्वारा आत्माके चैतन्यकी व्याप्ति बतायी है, वह भी युक्तिसंगत
१-यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति।
२-देखो सूत्र २।३।२७ की टिप्पणी।