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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

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Page 264

सूत्र २२ ] अध्याय २ २६१
बताये गये हैं, उसके वे ही कार्य हैं ऐसा समझ लेना चाहिये। वहाँ श्रुतिने
जलका कार्य मूत्र, रक्त और प्राणको तथा तेजका कार्य हड्डी, मज्जा और
वाणीको बताया है। अतः इन्हें ही उनका कार्य समझना चाहिये।
सम्बन्ध - जब तीनों तत्त्वोंका मिश्रण करके सबकी रचना की गयी,
तब खाये हुए किसी एक तत्त्वसे अमुक वस्तु हुई - इत्यादि रूपसे वर्णन
करना कैसे संगत हो सकता है? इसपर कहते हैं-
वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ॥ २।४।२२ ॥
तद्वादः = वह कथन; तद्वादः = वह कथन; तु = तो; वैशेष्यात् = अधिकताके
नातेसे है।
व्याख्या - तीनोंके मिश्रणमें भी एककी अधिकता और दूसरोंकी
न्यूनता रहती है, अतः जिसकी अधिकता रहती है उस अधिकताको
लेकर व्यवहारमें मिश्रित तत्त्वोंका अलग-अलग नामसे कथन किया
जाता है; इसलिये कोई विरोध नहीं है। यहाँ 'तद्वादः' पदका दो बार
प्रयोग अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है।
इस प्रकरणमें जो मनको अन्नका कार्य और अन्नमय कहा गया
है, प्राणोंको जलका कार्य और जलमय कहा गया है तथा वाणीको
तेजका कार्य और तेजोमयी कहा गया है, वह भी उन-उन तत्त्वोंके
सम्बन्धसे उनका उपकार होता हुआ देखा जानेके कारण गौणरूपसे
ही कहा हुआ मानना चाहिये। वास्तवमें मन, प्राण और वाणी आदि
इन्द्रियाँ भूतोंका कार्य नहीं हैं; भूतोंसे भिन्न पदार्थ हैं, यह बात पहले
सिद्ध की जा चुकी है (ब्र० सू० २।४।२)।
चौथा पाद सम्पूर्ण
श्रीवेदव्यास रचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-का दूसरा अध्याय पूरा हुआ।