वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र २-३ ] अध्याय २ १७१
सूत्र २-३ ] अध्याय २ १७१
बुद्धिमान् वैज्ञानिक तथा चतुर शिल्पी मनसे भी नहीं कर पाते, उस विचित्र
रचना-चातुर्ययुक्त अद्भुत जगत्की सृष्टि भला जड प्रकृति कैसे कर
सकती है ? मिट्टी, पत्थर आदि जड पदार्थोंमें इस प्रकार अपने-आप रचना
करनेकी कोई शक्ति नहीं देखी जाती है। अतः किसी भी युक्तिसे यह
सिद्ध नहीं हो सकता कि जड प्रधान इस जगत्का कारण है।
सम्बन्ध- अब दूसरी युक्तिसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते हैं—
प्रवृत्तेश्च ॥ २।२।२॥
प्रवृत्तेः=जगत्की रचनाके लिये जड प्रकृतिका प्रवृत्त होना; च=भी
सिद्ध नहीं होता (इसलिये प्रधान इस जगत्का कारण नहीं है)।
व्याख्या - जगत्की रचना करना तो दूर रहा, रचनादि कार्यके लिये
जड प्रकृतिमें प्रवृत्तिका होना भी असम्भव जान पड़ता है; क्योंकि
साम्यावस्थामें स्थित सत्त्व, रज और तम- इन तीनों गुणोंका नाम प्रधान
या प्रकृति है*, उस जड प्रधानका बिना किसी चेतनकी सहायताके
सृष्टिकार्य प्रारम्भ करनेके लिये प्रवृत्त होना कदापि सम्भव नहीं है। कोई
भी जड पदार्थ चेतनका सहयोग प्राप्त हुए बिना कभी अपने-आप किसी
कार्यमें प्रवृत्त होता हो, ऐसा नहीं देखा जाता है।
सम्बन्ध- अब पूर्वपक्षीके द्वारा दिये जानेवाले जल आदिके दृष्टान्तमें
भी चेतनका सहयोग दिखलाकर उपर्युक्त बातकी ही सिद्धि करते हैं—
पयोऽम्बुवच्चेत्तत्रापि ॥ २।२।३॥
चेत्=यदि कहो; पयोऽम्बुवत्=दूध और जलकी भाँति (जड
प्रधानका सृष्टि-रचनाके लिये प्रवृत्त होना सम्भव है); तत्रापि=तो उसमें
भी चेतनका सहयोग है (अतः केवल जडमें प्रवृत्ति न होनेसे उसके द्वारा
जगत्की रचना असम्भव है)।
- सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः। (सां० सू० १। ६१)
१७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
व्याख्या—यदि कहो कि 'जैसे अचेतन दूध बछड़ेकी पुष्टिके लिये
अपने-आप गायके थनमें उतर आता है* तथा अचेतन जल लोगोंके
उपकारके लिये अपने-आप नदी-निर्झर आदिके रूपमें बहता रहता है,
उसी प्रकार जड प्रधान भी जगत्की सृष्टिके कार्यमें बिना चेतनके
ही स्वयं प्रवृत्त हो सकता है' तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि
जिस प्रकार रथ आदि अचेतन वस्तुएँ बिना चेतनका सहयोग पाये
संचरण आदि कार्योंमें प्रवृत्त नहीं होतीं, उसी प्रकार थनमें दूध उतरने
और नदी-निर्झर आदिके बहनेमें भी अव्यक्त चेतनकी ही प्रेरणा काम
करती है, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है। शास्त्र भी इस
अनुमानका समर्थक है—'योऽप्सु तिष्ठन्... अपोऽन्तरो यमयति।'
(बृह० उ० ३।७।४) अर्थात् 'जो जलमें रहनेवाला है और उसके
भीतर रहकर उसका नियमन करता है।' 'एतस्य वा अक्षरस्य
प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते' (बृह० उ० ३।८।९)
अर्थात् 'हे गार्गि! इस अक्षर (परमात्मा)-के ही प्रशासनमें पूर्ववाहिनी
तथा अन्य नदियाँ बहती हैं।' इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे सिद्ध होता है कि
समस्त जड वस्तुओंका संचालक चेतन है। गायके थनमें जो दूध
उतरता है, उसमें भी चेतन गौका वात्सल्य और चेतन बछड़ेका चूसना
कारण है। इसी प्रकार जल नीची भूमिकी ओर ही स्वभावतः बहता
है। लोगोंके उपकारके लिये वह स्वयं उठकर ऊँची भूमिपर नहीं चला
जाता। परंतु चेतन पुरुष अपने प्रयत्नसे उस जलके प्रवाहको जिधर
चाहें मोड़ सकते हैं। इस प्रकार प्रत्येक प्रवृत्तिमें चेतनकी अपेक्षा सर्वत्र
देखी जाती है; इसलिये किसी भी युक्तिसे जड प्रधानका स्वतः
जगत्की रचनामें प्रवृत्त होना सिद्ध नहीं होता।
सम्बन्ध—अब प्रकारान्तरसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते हैं—
- अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य।
(सां० सू० ३।१७०)
सूत्र ४-५ ] अध्याय २ १७३
व्यतिरेकानवस्थितेश्च अनपेक्षत्वात् ॥ २।२।४॥
च=इसके सिवा; व्यतिरेकानवस्थितेः=सांख्यमतमें प्रधानके सिवा,
दूसरा कोई उसकी प्रवृत्ति या निवृत्तिका नियामक नहीं माना गया है,
इसलिये; (और) अनपेक्षत्वात्=प्रधानको किसीकी अपेक्षा नहीं है,
(इसलिये भी प्रधान कभी सृष्टिरूपमें परिणत होता और कभी नहीं होता
है, यह बात सम्भव नहीं जान पड़ती।)
व्याख्या—सांख्यमतावलम्बियोंकी मान्यताके अनुसार त्रिगुणात्मक प्रधानके
सिवा, दूसरा कोई कारण, प्रेरक या प्रवर्तक नहीं माना गया है। पुरुष उदासीन
है, वह न तो प्रधानका प्रवर्तक है, न निवर्तक। प्रधान स्वयं भी अनपेक्ष है,
वह किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता। ऐसी स्थितिमें जड प्रधान कभी तो
महत्तत्त्व आदि विकारोंके रूपमें परिणत होता है और कभी नहीं होता है, यह
कैसे युक्तिसंगत होगा। यदि जगत्की उत्पत्ति करना उसका स्वभाव अथवा
धर्म है, तब तो प्रलयके कार्यमें उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी ? और यदि स्वभाव
नहीं है तो उत्पत्तिके लिये प्रवृत्ति नहीं होगी। इस प्रकार कोई भी व्यवस्था न
हो सकनेके कारण प्रधान जगत्का कारण नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—तृणसे दूध बननेकी भाँति प्रकृतिसे स्वभावतः जगत्की उत्पत्ति
होती है, इस कथनकी असंगति दिखाते हुए कहते हैं—
अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॥ २।२।५॥
अन्यत्र=दूसरे स्थानमें; अभावात्=वैसे परिणामका अभाव है, इसलिये;
च=भी; तृणादिवत्=तृण आदिकी भाँति; (प्रधानका जगत्के रूपमें परिणत
होना) न=नहीं सिद्ध होता।
व्याख्या—जो घास ब्यायी हुई गौद्वारा खायी जाती है, उसीसे दूध
बनता है। वही घास यदि बैल या घोड़ेको खिला दी जाय या अन्यत्र रख दी
जाय तो उससे दूध नहीं बनता। इस प्रकार अन्य स्थानोंमें घास आदिका
वैसा परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि विशिष्ट चेतनके