वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
तीसरा अध्याय
॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
तीसरा अध्याय
पहला पाद
पूर्व दो अध्यायोंमें ब्रह्म और जीवात्माके स्वरूपका प्रतिपादन किया
गया, अब उस परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिका उपाय बतानेके लिये तीसरा
अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसीलिये इस अध्यायको साधनाध्याय अथवा
उपासनाध्याय कहते हैं। परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंमें सबसे पहले वैराग्यकी
आवश्यकता है। संसारके अनित्य भोगोंमें वैराग्य होनेसे ही मनुष्यमें परमात्माको
प्राप्त करनेकी शुभेच्छा प्रकट होती है और वह उसके लिये प्रयत्नशील होता
है। अतः वैराग्योत्पादनके लिये बार-बार जन्म-मृत्यु और गर्भादिके दुःखोंका
प्रदर्शन करानेके लिये पहला पाद आरम्भ किया जाता है।
प्रलयके बाद सृष्टि-कालमें उस परब्रह्म परमेश्वरसे जिस प्रकार इस
जगत्की उत्पत्ति होती है, उसका वर्णन तो पहले दो अध्यायोंमें किया गया।
उसके बाद वर्तमान जगत्में जो जीवात्माके शरीरोंका परिवर्तन होता रहता है,
उसके विषयमें श्रुतियोंने जैसा वर्णन किया है, उसपर इस तीसरे अध्यायके
प्रथम पादमें विचार किया जाता है। विचारका विषय यह है कि जब यह जीवात्मा
पहले शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है, तब अकेला ही जाता है या
और भी कोई इसके साथ जाता है। इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं—
तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्न-
निरूपणाभ्याम् ॥ ३ । १ । १ ॥
तदन्तरप्रतिपत्तौ = उक्त देहके बाद देहान्तरकी प्राप्तिके समय (यह
जीवात्मा); सम्परिष्वक्तः = शरीरके बीजरूप सूक्ष्म तत्त्वोंसे युक्त हुआ;
रंहति = जाता है (यह बात); प्रश्ननिरूपणाभ्याम् = प्रश्न और उसके
उत्तरसे सिद्ध होती है।
सूत्र १ ] अध्याय ३ २६३
व्याख्या—श्रुतियोंमें यह विषय कई जगह आया है, उनमेंसे जिस
स्थलका वर्णन स्पष्ट है, वह तो अपने-आप समझमें आ जाता है; परंतु
जहाँका वर्णन कुछ अस्पष्ट है, उसे स्पष्ट करनेके लिये यहाँ छान्दोग्योपनिषद्के
प्रकरणपर विचार किया जाता है। वहाँ यह वर्णन है कि श्वेतकेतु नामसे
प्रसिद्ध एक ऋषिकुमार था, वह एक समय पांचालोंकी सभामें गया। वहाँ
प्रवाहण नामक राजाने उससे पूछा—'क्या तुम अपने पितासे शिक्षा पा चुके
हो?' उसने कहा—'हाँ।' तब प्रवाहणने पूछा—'यहाँसे मरकर यह जीवात्मा
कहाँ जाता है? वहाँसे फिर कैसे लौटकर आता है? देवयान और
पितृयानमार्गका क्या अन्तर है? यहाँसे गये हुए लोगोंसे वहाँका लोक भर
क्यों नहीं जाता?—इन सब बातोंको और जिस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें
यह जल पुरुषरूप हो जाता है, इस बातको तू जानता है या नहीं?' तब
प्रत्येक बातके उत्तरमें श्वेतकेतुने यही कहा—'मैं नहीं जानता।' यह
सुनकर प्रवाहणने उसे फटकारा और कहा—'जब तुम इन सब बातोंको
नहीं जानते, तब कैसे कहते हो कि मैं शिक्षा पा चुका?' श्वेतकेतु लज्जित
होकर पिताके पास गया और बोला कि 'प्रवाहण नामवाले एक साधारण
क्षत्रियने मुझसे पाँच बातें पूछीं; किंतु उनमेंसे एकका भी उत्तर मैं न दे
सका। आपने मुझे कैसे कह दिया था कि मैं तुमको शिक्षा दे चुका हूँ।'
पिताने कहा—'मैं स्वयं इन पाँचोंमेंसे किसीको नहीं जानता, तब तुमको
कैसे बताता।' उसके बाद अपने पुत्रके सहित पिता उस राजाके पास गया
और धनादिके दानको स्वीकार न करके कहा—'आपने मेरे पुत्रसे जो
पाँच बातें पूछी थी, उन्हें ही मुझे बतलाइये।' तब उस राजाने बहुत
दिनोंतक उन दोनोंको अपने पास ठहराया और कहा कि 'आजतक यह
विद्या क्षत्रियोंके पास ही रही है, अब पहले-पहल आप ब्राह्मणोंको
मिल रही है।' यह कहकर राजा प्रवाहणने पहले उस पाँचवें प्रश्नका
उत्तर देना आरम्भ किया, जिसमें यह जिज्ञासा की गयी थी कि 'यह जल
पाँचवीं आहुतिमें पुरुषरूप कैसे हो जाता है?' वहाँ द्युलोकरूप अग्निमें
२६४ वेदान्त-दर्शन [पाद १
श्रद्धाकी पहली आहुति देनेसे राजा सोमकी उत्पत्ति बतायी है। दूसरी आहुति
है मेघरूप अग्निमें राजा सोमको हवन करना; उससे वर्षाकी उत्पत्ति बतायी
गयी है। तीसरी आहुति है पृथिवीरूप अग्निमें वर्षाको हवन करना; उससे
अन्नकी उत्पत्ति बतायी गयी है। चौथी आहुति है पुरुषरूप अग्निमें अन्नका
हवन करना; उससे वीर्यकी उत्पत्ति बतायी गयी है और पाँचवीं आहुति है
स्त्रीरूप अग्निमें वीर्यका हवन करना; उससे गर्भकी उत्पत्ति बताकर कहा है
कि इस तरह यह जल पाँचवीं आहुतिमें 'पुरुष' संज्ञक होता है। इस प्रकार
जन्म ग्रहण करनेवाला मनुष्य जबतक आयु होती है, तबतक यहाँ जीवित
रहता है—इत्यादि (छा० उ० ५।३।१ से ५।९।२ तक)।
इस प्रकरणमें जलके नामसे बीजरूप समस्त तत्त्वोंके समुदाय सूक्ष्म
शरीरसहित वीर्यमें स्थित जीवात्मा कहा गया है; अतः वहाँके प्रश्नोत्तरपूर्वक
विवेचनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा जब एक शरीरसे दूसरे शरीरमें
जाता है, तब बीजरूपमें स्थित समस्त तत्त्वोंसे युक्त होकर ही प्रयाण करता है।
सम्बन्ध—"इस प्रकरणमें तो केवल जलका ही पुरुष हो जाना कहा है,
फिर इसमें सभी सूक्ष्म तत्त्वोंका भी होना कैसे समझा जायगा, यदि श्रुतिको
यही बताना अभीष्ट था तो केवल जलका ही नाम क्यों लिया?'' इस
जिज्ञासापर कहते हैं—
त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ॥ ३।१।२॥
त्र्यात्मकत्वात्=(शरीर) तीनों तत्त्वोंका सम्मिश्रण है, इसलिये (जलके
कहनेसे सबका ग्रहण हो जाता है); तु=तथा; भूयस्त्वात्=वीर्यमें सबसे अधिक
जलका भाग रहता है, इसलिये (जलके नामसे उसका वर्णन किया गया है)।
व्याख्या—जगत्की उत्पत्तिके वर्णनमें कहा जा चुका है कि तीनों
तत्त्वोंका सम्मेलन करके उसके बाद परमेश्वरने नाम और रूपको प्रकट किया
(छा० उ० ६।३।३)। वहाँ तीन तत्त्वोंका वर्णन भी उपलब्ध है, उसमें सभी
तत्त्वोंका मिश्रण समझ लेना चाहिये। स्त्रीके गर्भमें जिस वीर्यका आधान किया
जाता है, उसमें सभी भौतिक तत्त्व रहते हैं तथापि जलकी अधिकता होनेसे
सूत्र ३ ] अध्याय ३ २६५
वहाँ उसीके नामसे उसका वर्णन किया गया है। वास्तवमें वह कथन शरीरके
बीजभूत सभी तत्त्वोंको लक्ष्य करानेवाला है। एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाते
समय जीव प्राणमें स्थित होकर जाते हैं और प्राणको आपोमय (जलरूप)
कहा गया है, अतः उस दृष्टिसे भी वहाँ जलको ही पुरुषरूप बताना सर्वथा
सुसंगत है। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि जीवात्मा सूक्ष्म तत्त्वोंसे युक्त हुआ
ही एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातकी पुष्टि करते हैं—
प्राणगतेश्च ॥ ३ । १ । ३ ॥
प्राणगतेः = जीवात्माके साथ प्राणोंके गमनका वर्णन होनेसे; च = भी
(यही बात सिद्ध होती है)।
व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्में आश्वलायन मुनिने पिप्पलादसे प्राणके
विषयमें कुछ प्रश्न किये हैं। उनमेंसे एक प्रश्न यह भी है कि ‘यह एक
शरीरको छोड़कर जब दूसरे शरीरमें जाता है, तब पहले शरीरसे किस
प्रकार निकलता है?’ (प्र० उ० ३। १) उसके उत्तरमें पिप्पलादने कहा
है कि ‘जब इस शरीरसे उदानवायु निकलता है, तब यह शरीर ठण्डा
हो जाता है, उस समय जीवात्मा मनमें विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर
उदानवायुके सहित दूसरे शरीरमें चला जाता है। उस समय जीवात्माका
जैसा संकल्प होता है, उस संकल्प और मन-इन्द्रियोंके सहित यह प्राणमें
स्थित हो जाता है। वह प्राण उदानके सहित जीवात्माको उसके
संकल्पानुसार भिन्न-भिन्न लोकों (योनियों)-में ले जाता है।’ (प्र० उ०
३। १० तक) इस प्रकार जीवात्माके साथ प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके
गमनका वर्णन होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि बीजरूप सभी सूक्ष्म
तत्त्वोंके सहित यह जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है।
छान्दोग्योपनिषद्में जो पहले-पहल श्रद्धाका हवन बताया गया है, वहाँ
श्रद्धाके नामसे संकल्पका ही हवन समझना चाहिये। भाव यह कि श्रद्धारूप
२६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
संकल्पकी आहुतिसे जो उसके सूक्ष्म शरीरका निर्माण हुआ, वही पहला
परिणाम राजा सोम हुआ; फिर उसका दूसरा परिणाम वर्षारूपसे मेघमें
स्थिति है, तीसरे परिणाममें पहुँचकर वह अन्नमें स्थित हुआ; चौथे
परिणाममें वीर्यरूपसे उसकी पुरुषमें स्थिति हुई और पाँचवें परिणाममें वह
गर्भ होकर स्त्रीके गर्भाशयमें स्थित हुआ। तदनन्तर वही मनुष्य होकर बाहर
आया। इस प्रकार दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता है। प्राणका सहयोग
सभी जगह है; क्योंकि गति प्राणके अधीन है, प्राणको जलमय बताया
ही गया है। इस प्रकार श्रुतिके समस्त वर्णनकी संगति बैठ जाती है।
सम्बन्ध— अब दूसरे प्रकारके विरोधका उल्लेख करके उसका निराकरण
करते हैं—
अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात्॥ ३।१।४॥
चेत्=यदि कहो कि; अग्न्यादिगतिश्रुतेः=अग्नि आदिमें प्रवेश करनेकी
बात दूसरी श्रुतिमें कही है, इसलिये (यह सिद्ध नहीं होता); इति न=तो यह
ठीक नहीं है; भाक्तत्वात्=क्योंकि वह श्रुति अन्यविषयक होनेसे गौण है।
व्याख्या—यदि कहो, “बृहदारण्यकके आर्तभाग और याज्ञवल्क्यके संवादमें
यह वर्णन आया है कि 'मरणकालमें वाणी अग्निमें विलीन हो जाती है, प्राण
वायुमें विलीन हो जाते हैं'—इत्यादि (बृह० उ० ३।२।१३) इससे यह
कहना सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा दूसरे तत्त्वोंके सहित जाता है, क्योंकि वे
सब तो अपने-अपने कारणमें यहीं विलीन हो जाते हैं।” तो ऐसी बात नहीं
है, क्योंकि यह बात आर्तभागने प्रश्नमें तो कही है, पर याज्ञवल्क्यने उत्तरमें
इसे स्वीकार नहीं किया, बल्कि सभासे अलग ले जाकर उसे गुप्तरूपसे वही
पाँच आहुतियोंवाली बात समझायी—यह अनुमान होता है; क्योंकि उसके
बाद श्रुति कहती है कि 'उन्होंने जो कुछ वर्णन किया, निस्संदेह वह कर्मका
ही वर्णन था। मनुष्य पुण्यकर्मोंसे पुण्यशील होता है और पापकर्मसे पापी
होता है।' छान्दोग्यके प्रकरणमें भी बादमें यही बात कही गयी है, इसलिये
वर्णनमें कोई भेद नहीं। वह श्रुति प्रश्नविषयक होनेसे गौण है, उत्तरकी बात