वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र २२ ] अध्याय २ १८९
सूत्र २२ ] अध्याय २ १८९
उनके नाम इस प्रकार हैं- अधिपतिप्रत्यय, सहकारिप्रत्यय, समनन्तरप्रत्यय
और आलम्बनप्रत्यय। ये क्रमशः इन्द्रिय, प्रकाश, मनोयोग और विषयके
पर्याय हैं। इन चारों हेतुओंके होनेपर ही विज्ञानकी उत्पत्ति होती है, यह
उनकी प्रतिज्ञा है। यदि कारणके बिना ही कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय तो
उक्त प्रतिज्ञा भंग होगी और यदि ऐसा नहीं मानते हैं तो कारण और कार्य
दोनोंकी एक कालमें सत्ता माननी पड़ेगी; अतः किसी प्रकार भी उनका
मत समीचीन अथवा उपादेय नहीं है।
सम्बन्ध - बौद्धमतानुयायी यह मानते हैं कि प्रतिसंख्या-निरोध, अप्रति-
संख्यानिरोध तथा आकाश- इन तीनोंके अतिरिक्त समस्त वस्तुएँ क्षणिक
(प्रतिक्षण नष्ट होनेवाली) हैं। दोनों निरोध और आकाश तो कोई वस्तु ही
नहीं हैं, ये अभावमात्र हैं। निरोध तो विनाशका बोधक होनेसे अभाव है ही,
आकाश भी आवरणका अभावमात्र ही है। इनमेंसे आकाशकी अभावरूपताका
निराकरण तो २४ वें सूत्रमें किया जायगा। यहाँ उनके माने हुए दो प्रकारके
निरोधोंका निराकरण करनेके लिये कहते हैं-
प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिरविच्छेदात् ॥ २।२।२२॥
प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिः = प्रतिसंख्यानिरोध और अप्रति-
संख्यानिरोध - इन दो प्रकारके निरोधोंकी सिद्धि नहीं हो सकती;
अविच्छेदात् = क्योंकि संतान (प्रवाह)-का विच्छेद नहीं होता।
व्याख्या- उनके मतमें जो बुद्धिपूर्वक सहेतुक विनाश है उसका नाम
प्रतिसंख्यानिरोध है। यह तो पूर्णज्ञानसे होनेवाले आत्यन्तिक प्रलयका वाचक
है। दूसरा जो स्वभावसे ही बिना किसी निमित्तके अबुद्धिपूर्वक विनाश होता
है, उसका नाम अप्रतिसंख्यानिरोध है। यह स्वाभाविक प्रलय है। यह दोनों
प्रकारका निरोध - किसी वस्तुका न रहना उनके मतानुसार सिद्ध नहीं हो
सकता; क्योंकि वे समस्त पदार्थोंको प्रतिक्षण विनाशशील मानते हैं और
असत् कारणोंसे 'सत्' कार्यकी उत्पत्ति भी प्रतिक्षण स्वीकार करते हैं। इस
मान्यताके अनुसार एक पदार्थका नाश और दूसरेकी उत्पत्तिका क्रम विद्यमान
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रहनेसे दोनोंकी परम्परा निरन्तर चलती ही रहेगी। इसके रुकनेका कोई
भी कारण उनकी मान्यताके अनुसार नहीं है। इसीलिये किसी प्रकारके
निरोधकी सिद्धि नहीं होगी।
सम्बन्ध— बौद्धमतवाले ऐसा मानते हैं कि सब पदार्थ क्षणिक और
असत्य होते हुए भी भ्रान्तिरूप अविद्याके कारण स्थिर और सत्य प्रतीत होते
हैं। ज्ञानके द्वारा अविद्याका अभाव होनेसे सबका अभाव हो जाता है। इस
प्रकार बुद्धिपूर्वक निरोधकी सिद्धि होती है। इसका निराकरण करनेके लिये
कहते हैं—
उभयथा च दोषात्॥ २। २। २३॥
उभयथा=दोनों प्रकारसे; च=भी; दोषात्=दोष आता है, इसलिये
(उनकी मान्यता युक्तिसंगत नहीं है)।
व्याख्या—यदि यह माना जाय कि भ्रान्तिरूप अविद्यासे प्रतीत होनेवाला
यह जगत् पूर्ण ज्ञानसे अविद्याका नाश होनेपर उसीके साथ नष्ट हो जाता है
तब तो जो बिना कारणके अपने-आप विनाश—सब पदार्थोंका अभाव माना
गया है, उस अप्रतिसंख्यानिरोधकी मान्यतामें विरोध आवेगा तथा यदि यह
माना जाय कि भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाला जगत् बिना पूर्ण ज्ञानके अपने-आप
नष्ट हो जाता है, तब ज्ञान और उसके साधनका उपदेश व्यर्थ होगा। अतः
उनका मत किसी प्रकार भी युक्तिसंगत नहीं है।
सम्बन्ध—अब आकाश कोई पदार्थ नहीं, किंतु आवरणका अभावमात्र
है, इस मान्यताका खण्डन करते हैं—
आकाशे चाविशेषात्॥ २। २। २४॥
आकाशे=आकाशके विषयमें; च=भी, उनकी मान्यता ठीक नहीं है;
अविशेषात्=क्योंकि अन्य भाव-पदार्थोंसे उसमें कोई विशेषता नहीं है।
व्याख्या—पृथिवी, जल आदि जितने भी भाव-पदार्थ देखे जाते हैं,
उन्हींकी भाँति आकाश भी भावरूप है। आकाशकी भी सत्ताका सबको बोध