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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र ७ ] अध्याय ३ २६९

सूत्र ७ ] अध्याय ३ २६९
अपेक्षा उनकी हीनता दिखानेके लिये), वा=ही; भाक्तम्=उनको देवताओंका
अन्न बतानेवाली श्रुति गौण है; हि=क्योंकि; तथा=उस प्रकारसे (उनका
हीनत्व और स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके भोगोंको भोगना) भी; दर्शयति=श्रुति
दिखलाती है।
व्याख्या—वे सकामभावसे शुभ कर्म करनेवाले लोग आत्मज्ञानी नहीं
हैं, अतः आत्मज्ञानकी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे उनको देवताओंका
अन्न और देवताओंद्वारा उनका भक्षण किया जाना कहा गया है, वास्तवमें तो
श्रुति यह कहती है कि 'देवतालोग न खाते हैं और न पीते हैं, इस अमृतको
देखकर ही तृप्त हो जाते हैं।' (छा० उ० ३।६।१)१ अतः इस कथनका यह
भाव है कि राजाके नौकरोंकी भाँति वह देवताओंके भोग्य यानी सेवक होते
हैं। इस भावके वचन श्रुतिमें दूसरी जगह भी पाये जाते हैं—'जो उस परमेश्वरको
न जानकर दूसरे देवताओंकी उपासना करता है, वह—जैसे यहाँ लोगोंके
घरोंमें पशु होते हैं, वैसे ही—देवताओंका पशु होता है।' (बृह० उ० १।
४।१०)२ आत्मज्ञानकी स्तुतिके लिये इस प्रकार कहना उचित ही है।
इसके सिवा, वे शुभ कर्मवाले लोग देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग
करते हैं, इसका श्रुतिमें इस तरह वर्णन किया गया है—'पितृलोकपर विजय
पानेवालोंकी अपेक्षा सौगुना आनन्द कर्मोंसे देवभावको प्राप्त होनेवालोंको
होता है ३।' तथा गीतामें भी इस प्रकार कहा गया है—
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥
'वे वहाँ विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः
मृत्युलोकमें लौट आते हैं। इस प्रकार वेदोक्त धर्मका आचरण करनेवाले वे
१-'न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥'
२-'अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते······यथा पशुरेवँस देवानाम्।'
३-अथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः·········स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये
कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्ते। (बृह० उ० ४।३।३३)

२७० वेदान्त-दर्शन [ पाद १
भोगकामी मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते रहते हैं।' (गीता ९।२१) इसलिये
यह सिद्ध हुआ कि उनको देवताओंका अन्न कहना वहाँ गौणरूपसे है,
वास्तवमें वहाँ जाकर वे अपने कर्मोंका ही फल भोगते हैं और फिर वहाँसे
वापस लौट आते हैं। अतः जीवात्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें सूक्ष्म
तत्त्वोंके सहित जाना सर्वथा सुसंगत है, इसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—"उक्त प्रकरणमें कहा गया है कि 'जबतक उसके कर्मोंका
क्षय नहीं हो जाता, तबतक वह वहीं रहता है, फिर वहाँसे इस लोकमें लौट
आता है' अतः प्रश्न होता है कि उसके सभी पुण्यकर्म पूर्णतया समाप्त हो
जाते हैं या कुछ कर्म शेष रहता है, जिसे साथ लेकर वह लौटता है।" इसका
निर्णय करनेके लिये कहते हैं—
कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां यथेतमनेवं च ॥ ३ । १ । ८ ॥
कृतात्यये=किये हुए पुण्य कर्मोंका क्षय होनेपर, अनुशयवान्=शेष
कर्मसंस्कारोंसे युक्त (जीवात्मा); यथेतम्=जैसे गया था उसी मार्गसे; च=
अथवा; अनेवम्=इससे भिन्न किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता है;
दृष्टस्मृतिभ्याम्=श्रुति और स्मृतियोंसे (यही बात सिद्ध होती है)।
व्याख्या—उस जीवके द्वारा किये हुए कर्मोंमेंसे जिनका फल भोगनेके
लिये उसे स्वर्गलोकमें भेजा गया है, उन पुण्यकर्मोंका पूर्णतया क्षय हो
जानेपर वह स्वर्गस्थ जीवात्मा अनुशयसे अर्थात् शेष कर्मसंस्कारोंसे युक्त
होकर जिस मार्गसे गया था, उसीसे अथवा किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता
है। इस प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है—'तद् य इह रमणीयचरणा
अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्......अथ य इह कपूयचरणा
अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन्।' अर्थात् 'अच्छे आचरणोंवाले
अच्छी योनिको प्राप्त होते हैं और बुरे आचरणोंवाले बुरी योनियोंको प्राप्त
होते हैं।' (छा० उ० ५।१०।७) इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है तथा स्मृतिमें
जो यह कहा गया है कि 'जो वर्णाश्रमी मनुष्य अपने कर्मोंमें स्थित रहनेवाले

सूत्र ९-१० ] अध्याय ३ २७१
हैं, वे यहाँसे स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ कर्मोंका फल भोगकर बचे हुए
कर्मोंके अनुसार अच्छे जन्म, कुल, रूप आदिको प्राप्त होते हैं।' (गौतमस्मृति
११।१) इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात सिद्ध होती है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण
करते हैं—
चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॥ ३ । १ । ९ ॥
चेत् = यदि ऐसा कहो कि; चरणात् = चरण शब्दका प्रयोग है, इसलिये
(यह कहना उचित नहीं है कि वह शेष कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर आता है);
इति न = तो ऐसी बात नहीं है; उपलक्षणार्था = क्योंकि वह कथन अनुशय (शेष
कर्म-संस्कारों)-का उपलक्षण करनेके लिये है; इति = यह बात; कार्ष्णाजिनिः =
'कार्ष्णाजिनि' नामक आचार्य कहते हैं (इसलिये कोई विरोध नहीं है)।
व्याख्या—उपर्युक्त शंकाका उत्तर अपनी ओरसे न देकर आचार्य
कार्ष्णाजिनिका मत उपस्थित करते हुए सूत्रकार कहते हैं—यदि पूर्वपक्षीद्वारा
यह कहा जाय कि “यहाँ 'रमणीयचरणाः' इत्यादि श्रुतिमें तो चरण शब्दका प्रयोग
है, जो कर्मसंस्कारका वाचक नहीं है; इसलिये यह सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा
स्वर्गलोकसे लौटते समय बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए लौटता
है'' तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ जो 'चरण' शब्द है, वह अनुशयका
उपलक्षण करानेके लिये है अर्थात् यह सूचित करनेके लिये ही है कि जीवात्मा
भुक्तशेष कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर लौटता है, अतः कोई दोष नहीं है।
सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनमें पुनः शंका उपस्थित करके उसका निराकरण
करते हैं—
आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥ ३ । १ । १० ॥
चेत् = यदि कहो; आनर्थक्यम् = (बिना किसी कारणके उपलक्षणके
रूपमें 'चरण' शब्दका प्रयोग करना) निरर्थक है; इति न = तो यह ठीक
नहीं; तदपेक्षत्वात् = क्योंकि कर्माशयमें आचरण आवश्यक है।