वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र ३४ ] अध्याय २ १६५
सूत्र ३४ ] अध्याय २ १६५
सम्बन्ध — यदि परब्रह्म परमात्माको जगत्का कारण माना जाय तो
उसमें विषमता (राग-द्वेषपूर्ण भाव) तथा निर्दयताका दोष आता है; क्योंकि
वह देवता आदिको अधिक सुखी और पशु आदिको अत्यन्त दुःखी बनाता
है तथा मनुष्योंको सुख-दुःखसे परिपूर्ण मध्यम स्थितिमें उत्पन्न करता है।
जिन्हें वह सुखी बनाता है, उनके प्रति उसका राग या पक्षपात सूचित होता है
और जिन्हें दुःखी बनाता है, उनके प्रति उसकी द्वेष-बुद्धि एवं निर्दयता प्रतीत
होती है। इस दोषका निराकरण करनेके लिये कहते हैं—
वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति ॥ २ । १ । ३४ ॥
वैषम्यनैर्घृण्ये = (परमेश्वरमें) विषमता और निर्दयताका दोष; न=नहीं
आता; सापेक्षत्वात् = क्योंकि वह जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा
रखकर सृष्टि करता है; तथा हि = ऐसा ही; दर्शयति = श्रुति दिखलाती है।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा है—'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति
पापः पापेन।' (बृह० उ० ३।२।१३) अर्थात् 'निश्चय ही यह जीव पुण्य कर्मसे
पुण्यशील होता—पुण्ययोनिमें जन्म पाता है और पाप-कर्मसे पापशील होता—
पापयोनिमें जन्म ग्रहण करता है।' 'साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो
भवति।' (बृह० उ० ४।४।५) अर्थात् 'अच्छे कर्म करनेवाला अच्छा होता
है—सुखी एवं सदाचारी कुलमें जन्म पाता है और पाप करनेवाला पापात्मा
होता है—पापयोनिमें जन्म ग्रहण करके दुःख उठाता है।' इत्यादि। इस
वर्णनसे स्पष्ट है कि जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर ही परमात्मा
समर्थ हैं। उनकी इस अद्भुत शक्तिको देखकर, सुनकर और समझकर भगवदीय सत्ता और
उनके गुण-प्रभावपर श्रद्धा-विश्वास करके उनकी शरणमें जानेसे मनुष्य अनायास ही
चिरशान्ति और भगवत्प्रेम प्राप्त कर सकता है। भगवान् सबके सुहृद् हैं, उनकी एक-एक
लीला जगत्के जीवोंके उद्धारके लिये होती है; इस प्रकार उनकी दिव्य लीलाका रहस्य
समझमें आ जानेपर मनुष्यका जगत्में प्रतिक्षण घटित होनेवाली घटनाओंके प्रति राग-
द्वेषका अभाव हो जाता है; उसे किसी भी बातसे हर्ष या शोक नहीं होता। अतः साधकको
इसपर विशेष ध्यान देकर भगवान्के भजन-चिन्तनमें संलग्न रहना चाहिये।
उनको कर्मानुसार अच्छी-बुरी (सुखी-दुःखी) योनियोंमें उत्पन्न करते
हैं। इसलिये अच्छे न्यायाधीशकी भाँति निष्पक्षभावसे न्याय करनेवाले
परमात्मापर विषमता और निर्दयताका दोष नहीं लगाया जा सकता
है। स्मृतियोंमें भी जगह-जगह कहा गया है कि जीवको अपने
शुभाशुभ कर्मके अनुसार सुख-दुःखकी प्राप्ति होती है। जैसे-
'कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।' (गीता १४।१६) अर्थात्
'पुण्यकर्मका फल सात्त्विक एवं निर्मल बताया गया है।' इसी प्रकार
भगवान्ने अशुभ कर्ममें रत रहनेवाले असुर-स्वभावके लोगोंको
आसुरी योनिमें डालनेकी बात बतायी है। * इन प्रमाणोंसे परमेश्वरमें
उपर्युक्त दोषोंका सर्वथा अभाव सिद्ध होता है; अतः उन्हें जगत्का
कारण मानना ठीक ही है।
सम्बन्ध - पूर्वसूत्रमें कही गयी बातपर शंका उपस्थित करके उसका
निराकरण करते हैं-
न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ २।१।३५ ॥
चेत् = यदि कहो; कर्माविभागात् = जगत्की उत्पत्तिसे पहले जीव और
उनके कर्मोंका ब्रह्मसे विभाग नहीं था, इसलिये; न=परमात्मा कर्मोंकी
अपेक्षासे सृष्टि करता है, यह कहना नहीं बन सकता; इति न= तो ऐसी
बात नहीं है; अनादित्वात् = क्योंकि जीव और उनके कर्म अनादि हैं।
- अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥
(गीता १६। १८-१९)
'जो अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोधका आश्रय ले अपने तथा दूसरोंके शरीरोंमें
अन्तर्यामीरूपसे स्थित मुझ परमेश्वरसे द्वेष रखते हैं, निन्दा करते हैं; उन द्वेषी, क्रूर, अशुभ-
कर्मपरायण नीच मनुष्योंको मैं निरन्तर संसारमें आसुरी योनियोंमें ही डालता हूँ।'