अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-३ देवता—व्याघ्र
(८)
ईश्वर के द्वारा सब से प्रथम निर्मित जलों ने हिरण्यगर्भ को जन्म देने के लिए ईश्वर के
वीर्य को धारण किया. उस उत्पन्न होने वाले प्रजापति के उल्ब अर्थात् गर्भ को घेरने वाली
झील स्वर्णमय थी. हम हव्य द्वारा उस प्रजापति की पूजा करते हैं. (८)
सूक्त-३ देवता—व्याघ्र
उदितस्त्रयो अक्रमन् व्याघ्रः पुरुषो वृकः.
हिरुग्धि यन्ति सिन्धवो हिरुग् देवो वनस्पतिर्हिरुङ् नमन्तु शत्रवः.. (१)
बाघ, चोर मनुष्य और भेड़िए—ये तीन इस स्थान से भाग कर दूर चले जाएं. जिस
प्रकार सरिताएं गूढ़ रूप में बहती हैं, उसी प्रकार बाघ आदि भी दिखाई न दें. वनस्पतियों के
अधिष्ठाता देव जिस प्रकार वनस्पतियों में छिपे रहते हैं, उसी प्रकार बाघ आदि भी लुप्त हो
जाएं. बाघ आदि के जो शत्रु हैं, वे उन्हें दूर भगा दें. (१)
परेणैतु पथा वृकः परमेणोत तस्करः.
परेण दत्वती रज्जुः परेणाघायुरर्षतु.. (२)
जंगली हिंसक पशु भेड़िया हमारे चलनेफिरने के मार्ग से दूर चला जाए. चोर भेड़िए से
भी अधिक दूर चला जाए. दांतों वाले, रस्सी के आकार वाले एवं दूसरे की हिंसा करने वाले
सांप के अतिरिक्त अन्य हिंसक प्राणी भी हमारे संचरण मार्ग से दूर चले जाएं. (२)
अक्ष्यौ च ते मुखं च ते व्याघ्र जम्भयामसि.
आत् सर्वान् विंशतिं नखान्.. (३)
हे बाघ! मैं तेरी दोनों आंखों और मुख को नष्ट करता हूं. इस के अतिरिक्त मैं तेरे चारों
पैरों के बीस नाखूनों को भी नष्ट करता हूं. (३)
व्याघ्रं दत्वतां वयं प्रथमं जम्भयामसि.
आदु ष्टेनमथो अहिं यातुधानमथो वृकम्.. (४)
हम दांतों से हिंसा करने वाले पशुओं में सब से पहले बाघ का नाश करते हैं. इस के
पश्चात हम चोर, सर्प, यक्ष, राक्षस आदि तथा भेड़िए का नाश करते हैं. (४)
यो अद्य स्तेन आयति स संपिष्टो अपायति.
पथामपध्वंसेनेत्विन्द्रो वज्रेण हन्तु तम्.. (५)
आज जो चोर आता है, वह हमारे द्वारा कुटपिट कर दूर भागे. वह मार्गों में से
कष्टदायक मार्ग से जाए और इंद्र अपने वज्र से उस की हिंसा करें. (५)
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मूर्णा मृगस्य दन्ता अपिशीर्णा उ पृष्टयः.
निम्रुक् ते गोधा भवतु नीचायच्छशयुर्मृगः.. (६)
बाघ आदि हिंसक पशुओं के दांत भोथरे अर्थात् खाने में असमर्थ हो जाएं. उन के सींग
और पसलियों की हड्डियां भी पैनी न रहें. हे पथिक! वह तेरे मार्ग में दिखाई न दे और सोने
वाले दुष्ट पशु भी पिछले मार्ग से दूर चले जाएं. (६)
यत् संयमो न वि यमो वि यमो यन्न संयमः.
इन्द्रजाः सोमजा आथर्वणमसि व्याघ्रजम्भनम्.. (७)
जहां मंत्र के सामर्थ्य से इंद्र और सोम से संबंधित संयमन कभी विपरीत प्रभाव नहीं
डालता. हे क्रियाकलाप! तू अथर्वा महर्षि द्वारा दिया हुआ है, इसलिए तू बाघ आदि दुष्ट
प्राणियों का हिंसक बन. (७)
सूक्त-४ देवता—वनस्पति आदि
यां त्वा गन्धर्वो अखनद् वरुणाय मृतभ्रजे.
तां त्वा वयं खनामस्योषधिं शेपहर्षणीम्.. (१)
हे कपित्थ अर्थात् कैथ नाम के वृक्ष एवं फल! वरुण का पौरुष नष्ट होने पर उन्हें वह
शक्ति पुनः प्राप्त कराने के लिए गंधर्वों ने तुझे खोद कर प्राप्त किया था. उसी शक्तिवर्धक
ओषधि को हम खोदते हैं. (१)
उदुषा उदु सूर्य उदिदं मामकं वचः.
उदेजतु प्रजापतिर्वृषा शुष्मेण वाजिना.. (२)
सूर्यपत्नी उषा शक्तिशाली वीर्य से युक्त हो तथा सूर्यदेव उसे उत्कृष्ट वीर्य संपन्न करें. मेरा
यह मंत्र भी शक्तिशाली हो तथा जगत् के स्रष्टा प्रजापति देव भी इसे अपने बल वीर्य से उन्नत
करें. (२)
यथा स्म ते विरोहतोऽभितप्तमिवानति.
ततस्ते शुष्मवत्तरमियं कृणोत्वोषधिः.. (३)
हे वीर्य के इच्छुक पुरुष! पुत्र, पौत्र आदि के रूप में विरोहण के कारण तेरी पुरुष इंद्रिय
क्रोधित सांप के फन के समान चेष्टा कर सके, इसी कारण मैं तुझे यह ओषधि प्रदान करता
हूं. (३)
उच्छुष्मौषधीनां सार ऋषभाणाम्.
सं पुंसामिन्द्र वृष्ण्यमस्मिन् धेहि तनूवशिन्.. (४)
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वीर्य वर्धक ओषधियों में श्रेष्ठ तथा गर्भाधान में समर्थ पुरुषों का सार यह ओषधि तुझे
वीर्य युक्त करे. हे इंद्र! पुष्ट करने वाली ओषधियों में जो वीर्य है, उसे इस पुरुष के शरीर में
धारण करो. (४)
अपां रसः प्रथमजो ऽ थो वनस्पतीनाम्.
उत सोमस्य भ्रातास्युताशर्मसि वृष्ण्यम्.. (५)
हे कपित्थ की जड़! तू जलों के मंथन के समय सब से पहले रस के रूप में उत्पन्न हुई.
तू सभी वृक्षों का सार और सोम की सजातीय है. तू अंगिरा आदि ऋषियों के मंत्रों से उत्पन्न
वीर्य है. (५)
अद्याग्ने अद्य सवितरद्य देवि सरस्वति.
अद्यास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिवा तानया पसः.. (६)
हे अग्नि, सरिता, देवी सरस्वती और ब्रह्मणस्पति! इस वीर्य चाहने वाले पुरुष की
पुरुषइंद्रिय को आज वीर्य प्रदान कर के धनुष के समान तान दो. (६)
आहं तनोमि ते पसो अधि ज्यामिव धन्वनि.
क्रमस्वर्श इव रोहितमनवग्लायता सदा.. (७)
हे वीर्य के इच्छुक पुरुष! मैं तेरी पुरुषइंद्रिय को अपने मंत्र के प्रभाव से धनुष पर चढ़ी
डोरी के समान सशक्त बनाता हूं. इस कारण तू गर्भाधान करने में समर्थ बैल के समान प्रसन्न
मन से सदा अपनी पत्नी पर आक्रमण कर. (७)
अश्वस्याश्वतरस्याजस्य पेत्वस्य च.
अथ ऋषभस्य ये वाजास्तानस्तिन् धेहि तनूवशिन्.. (८)
हे ओषधि! घोड़ों, बच्चों, बकरों, मेढ़ों और बैलों में जो वीर्य है, तू इस पुरुष के शरीर में
वैसा ही वीर्य स्थापित कर. (८)
सूक्त-५ देवता—वृषभ
सहस्रशृङ्गो वृषभो यः समुद्रादुदाचरत्.
तेना सहस्येना वयं नि जनान्त्स्वापयामसि.. (१)
कामनाओं एवं जल की वर्षा करने वाले सूर्य उदयाचल के समीपवर्ती सागर से उदय
होते हैं. उदित एवं शत्रुओं को वश में करने वाले सूर्य के द्वारा हम अपने सामने स्थित
व्यक्तियों को निद्रा-परवश बनाते हैं. (१)
न भूमिं वातो अति वाति नाति पश्यति कश्चन.
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स्त्रियश्च सर्वाः स्वापय शुनश्चेन्द्रसखा चरन्.. (२)
भूमि पर वायु अधिक न चले अर्थात् तेज हवा के कारण लोगों की नींद न टूटे. सोए हुए
व्यक्तियों में से कोई भी दूसरों को न देख सके. हे इंद्र के मित्र वायु! तुम प्राण वायु के रूप में
शरीर में वर्तमान रह कर सभी समीपवर्ती स्त्रियों और कुत्तों को सुला दो. (२)
प्रोष्ठेशयास्तल्पेशया नारीर्या वह्यशीवरीः.
स्त्रियो याः पुण्यगन्धयस्ताः सर्वाः स्वापयामसि.. (३)
जो स्त्रियां आंगन में अथवा पलंग पर सो रही हैं अथवा जो स्त्रियां झूले आदि में सोने
की अभ्यस्त हैं और उत्तम गंध वाली हैं, उन सब को मैं सुलाता हूं. (३)
एजदेजदजग्रभं चक्षुः प्राणमजग्रभम्.
अङ्गान्यजग्रभं सर्वा रात्रीणामतिशर्वरे.. (४)
सभी गतिशील प्राणियों को मैं ने सुला दिया. उन के नेत्र और नासिका निद्रा द्वारा गृहीत
हैं. उन के हस्त, चरण आदि को भी मैं ने निद्रा मग्न करा दिया है. यह सब मध्य रात्रि के समय
किया है, जब अंधकार की अधिकता होती है. (४)
य आस्ते यश्चरति यश्च तिष्ठन् विपश्यति.
तेषां सं दध्मो अक्षीणि यथेदं हर्म्यं तथा.. (५)
हमारे संचरण के समय जो मार्ग में बैठा है तथा जो ठहर कर देख रहा है, मैं उन सब की
आंखें इस प्रकार बंद करता हूं, जिस प्रकार दिखाई देने वाला यह भवन देखने में असमर्थ है.
(५)
स्वप्तु माता स्वप्तु पिता स्वप्तु श्वा स्वप्तु विशपतिः.
स्वपन्त्वस्यै ज्ञातयः स्वप्त्वयमभितो जनः.. (६)
जिस स्त्री को निद्रित कर के हम वश में करने के इच्छुक हैं, उस की माता सब से पहले
सो जाए. इस के पश्चात उस का पिता, घर की रक्षा करने वाला कुत्ता और घर का स्वामी उस
का पति भी सो जाए. उस के बंधुबांधव एवं उस के घर की रक्षा के लिए नियुक्त चारों ओर
स्थित जन भी सो जाएं. (६)
स्वप्न स्वप्नाभिकरणेन सर्वं नि ष्वापया जनम्.
ओत्सूर्यमन्यान्त्स्वापायाव्युषं जागृतादहमिन्द्र इवारिष्टो अक्षितः.. (७)
हे स्वप्न के देव! शय्या आदि पर सोने वाले इन जनों को तथा अन्य व्यक्तियों को सूर्योदय
तक निद्रा मग्न रखो. सब के सो जाने पर हिंसा और क्षय से रहित हो कर इंद्र के समान मैं
भोग में संलग्न रहूं एवं जागरण करूं. (७)
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सूक्त-६ देवता—ब्राह्मण आदि
ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः.
स सोमं प्रथमः पपौ स चकारारसं विषम्.. (१)
सर्पों में सब से पहले तक्षक उत्पन्न हुआ, जो मनुष्यों में ब्राह्मण के समान सर्पों में पूज्य
था. उस के दस शीश और दस मुख थे. क्षत्रिय आदि जातियों वाले सर्पों से पहले उत्पन्न होने
के कारण तक्षक ने सब से पहले स्वर्गलोक में स्थित अमृत पिया. सोम अर्थात् अमृत पीने
वाला ब्राह्मण तक्षक कंद मूल आदि से उत्पन्न रस को विष के प्रभाव से हीन बनाए. (१)
यावती द्यावापृथिवी वरिम्णा यावत् सप्त सिन्धवो वितष्ठिरे.
वाचं विषस्य दूषणीं तामितो निरवादिषम्.. (२)
धरती और आकाश का जितना विस्तार है तथा सागर जितने परिमाण में स्थित है, मैं
इन दोनों स्थानों में स्थित कंद, मूल, फल से उत्पन्न विष को नष्ट करने वाले मंत्रों से युक्त वाणी
का उच्चारण करता हूं. (२)
सुपर्णस्त्वा गरुत्मान् विष प्रथममावयत्.
नामीमदो नारूरुप उतास्मा अभवः पितुः.. (३)
हे विष! सब से पहले सुंदर पंखों वाले गरुड़ ने तुम्हें खाया था. इस कारण तू इस पुरुष
को मतवाला मत बना एवं विमूढ़ मत कर. हे विष! तू इस के लिए अन्न बन जा. (३)
यस्त आस्यत् पञ्चाङ्गुरिर्वक्राच्चिदधि धन्वनः.
अपस्कम्भस्य शल्यान्निरवोचमहं विषम्.. (४)
पांच अंगुलियों वाले जिस हाथ ने डोरी चढ़े हुए होने के कारण झुके हुए धनुष के द्वारा
पुरुष के शरीर में विष को पहुंचाया है, उस हाथ को मैं सुपारी वृक्ष के टुकड़े से मंत्रों की
सहायता से प्रभावहीन करता हूं. (४)
शल्याद् विषं निरवोचं प्राञ्जनादुत पर्णधेः.
अपाष्ठाच्छृङ्गात् कुल्मलान्निरवोचमहं विषम्.. (५)
बाणों में लगे फल से जिस विष ने शरीर में प्रवेश किया, उसे मैं मंत्र बल से बाहर
निकालता हूं. विषैले पत्तों वाले वृक्ष से, लेप से, पत्तों से, पशु के सींग से एवं मल से जो विष
उत्पन्न हुआ है, उसे मैं अपने मंत्र बल से शरीर से अलग करता हूं. (५)
अरसस्त इषो शल्यो ऽ थो ते अरसं विषम्.
उतारसस्य वृक्षस्य धनुष्टे अरसारसम्.. (६)
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हे बाण! तेरा विष बुझा हुआ फल विष रहित हो जाए. इस के बाद तेरा विष प्रभावहीन
हो जाए. सारहीन वृक्ष से बना हुआ और तुझ से संबंधित धनुष भी प्रभावहीन हो जाए. (६)
ये अपीषन् ये अदिहन् य आस्यन् ये अवासृजन्.
सर्वे ते वध्रयः कृता वध्रिर्विषगिरिः कृतः.. (७)
जो लोग विषपूर्ण जड़ीबूटियों को पीस कर खिलाते हैं, जो लोग लेप के रूप में विष का
प्रयोग करते हैं, जो विष को दूर से फेंकते हैं तथा जो समीप रह कर अन्न, फल आदि में विष
मिला देते हैं, मैं ने अपने मंत्र के प्रभाव से इन सब को शक्तिहीन बना दिया है. जिन पर्वतों पर
कंद मूल के रूप में विष उत्पन्न होता था, उन्हें भी मैं ने शक्तिहीन कर दिया है. (७)
वध्रयस्ते खनितारो वध्रिस्त्वमस्योषधे.
वध्रिः स पर्वतो गिर्यतो जातमिदं विषम्.. (८)
हे विषयुक्त जड़ीबूटी! तुझे खोदने वाले शक्तिहीन हो जाएं तथा मेरे मंत्र के प्रभाव से तू
भी प्रभावहीन हो जा. जिन पर्वतों पर विषैले कंदमूल उत्पन्न होते हैं, वे भी शक्तिहीन हो जाएं.
(८)
सूक्त-७ देवता—वनस्पति
वारिदं वारयातै वरणावत्यामधि.
तत्रामृतस्यासिक्तं तेना ते वारये विषम्.. (१)
वारण वृक्ष जहां उत्पन्न होते हैं, उस वारणावती का विषहारी जल हम मनुष्यों के विष
को दूर करता है. उस जल में स्वर्ग स्थित अमृत का विषनाशक प्रभाव विद्यमान है. इस कारण
मैं उस अमृतमय जल से तेरे कंद, मूल आदि से उत्पन्न विष को दूर करता हूं. (१)
अरसं प्राच्यं विषमरसं यदुदीच्यम्.
अथेदमशराच्यं करम्भेण वि कल्पते.. (२)
मेरी मंत्र शक्ति से पूर्व दिशा और उत्तर दिशा में उत्पन्न होने वाला विष प्रभावहीन हो
जाए. दक्षिण, पश्चिम तथा नीचे की दिशा में उत्पन्न होने वाले विष करंभ (भात) से
सामर्थ्यहीन हो जाए. (२)
करम्भं कृत्वा तिर्यं पीबस्पाकममुदारथिम्.
क्षुधा किल त्वा दुष्टनो जक्षिवान्त्स न रूरुपः.. (३)
हे दुष्ट शरीर वाले विष! बिना जाने हुए खाया हुआ तू चरबी को जलाने वाला और उदर
संबंधी रोगों का जनक है. इस पुरुष ने तुझे करंभ (भात) समझ कर खाया था. तू इस पुरुष
को मूर्च्छित मत बना. (३)
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वि ते मदं मदावति शरमिव पातयामसि.
प्र त्वा चरुमिव येषन्तं वचसा स्थापयामसि.. (४)
हे मूर्च्छित करने वाली जड़ीबूटी! तेरे मूर्च्छा लाने वाले विष को मैं शरीर से इस प्रकार
दूर करता हूं, जिस प्रकार धनुष से छूटा हुआ बाण दूर गिरता है. हे विष! तू गुप्त रूप से जाने
वाले दूत के समान शरीर के अंगों में व्याप्त हो जाता है. मैं अपनी मंत्र शक्ति से तुझे शरीर से
निकाल कर दूर करता हूं. (४)
परि ग्राममिवाचितं वचसा स्थापयामसि.
तिष्ठा वृक्ष इव स्थामन्यभिखाते न रूरुप:.. (५)
हे खोदने से प्राप्त होने वाली जड़ीबूटी! जनसमूह के समान प्रभावशाली तेरे विष को
भी हम अपनी मंत्र शक्ति के द्वारा शरीर से निकाल कर दूर स्थापित करते हैं. तू अपने स्थान
पर वृक्ष के समान निश्चल रह तथा इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (५)
पवस्तैस्त्वा पर्यक्रीणन् दूर्शीभिरजिनैरुत.
प्रक्रीरसि त्वमोधे ऽ भ्रिखाते न रूरुप:.. (६)
हे विषमूलक जड़ीबूटी! महर्षियों ने तुझे झाड़ू के तिनकों के बदले खरीदा है. तू हरिण
आदि पशुओं के चर्म के बदले क्रय की गई है. तू बड़े परिश्रम से खरीदी गई है, इसलिए यहां
से दूर हो जा और इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (६)
अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे.
वीरान् नो अत्र मा दभन् तद् व एतत् पुरो दधे.. (७)
हे पुरुषो! तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करने वाले शत्रुओं ने पहले जो यज्ञ आदि कर्म किए
हैं, उन कर्मों के द्वारा वे हमारे पुत्र, पौत्र आदि को इस स्थान पर हिंसित न करें. किया जाता
हुआ यह चिकित्सा कर्म मैं उन की रक्षा के लिए तुम्हारे सामने उपस्थित करता हूं. (७)
सूक्त-८ देवता—जल
भूतो भूतेषु पय आ दधाति स भूतानामधिपतिर्बभूव.
तस्य मृत्युश्चरति राजसूयं स राजा राज्यमनु मन्यतामिदम्.. (१)
अभिषेक द्वारा ऐश्वर्य प्राप्त करने वाला राजा ही समृद्ध जनपदों में भोज्य सामग्री
पहुंचाता है. इस प्रकार वह प्राणियों का स्वामी हुआ. मृत्यु के देव यमराज दुष्टों को दंड
दिलाने और सज्जनों का पालन करने के लिए ही राजा का राजसूय यज्ञ कराते हैं. वह राजा
इस राज्य को तथा दुष्ट निग्रह और सज्जन परिपालन के कर्म को स्वीकार करे. (१)
अभि प्रेहि माप वेन उग्रश्चेत्ता सपत्नहा.
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आ तिष्ठ मित्रवर्धन तुभ्यं देवा अधि ब्रुवन्.. (२)
हे राजा! तुम सिंहासन तथा हाथी, रथ, घोड़ा आदि सवारियों के प्रति अनिच्छा मत
करो. तुम शक्तिशाली एवं कार्य अकार्य का ज्ञान रखने वाले हो. तुम शत्रु हंता हो,
राजसिंहासन पर बैठ कर तुम मित्रों का कल्याण करो. इंद्र आदि देव तुम्हें अपना कहें. (२)
आतिष्ठन्तं परि विश्वे अभूषञ्छ्रियं वसानश्चरति स्वरोचिः.
महत् तद् वृष्णो असुरस्य नामा विश्वरूपो अमृतानि तस्थौ.. (३)
सिंहासन पर बैठे हुए राजा की सब लोग सेवा करें. राजा भी सिंहासन पर बैठ कर
राज्यलक्ष्मी को धारण करे, तेजस्वी बने तथा प्रजा पालन में तत्पर हो. अभिषेक से उत्पन्न
राज्यतेज दसों दिशाओं में फैल जाए. शत्रुओं को दूर भगाने वाले राजा के नाममात्र से शत्रु
भयभीत होने लगें. यह राजा शत्रु, मित्र, पत्नी आदि के प्रति विविध प्रकार का व्यवहार करता
हुआ दंड, युद्ध, अध्ययन आदि कर्म करे. (३)
व्याघ्रो अधि वैयाघ्रे वि क्रमस्व दिशो महीः.
विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्त्वापो दिव्याः पयस्वतीः.. (४)
हे राजा! तुम व्याघ्रचर्म पर बैठ कर और बाघ के समान अपराजेय हो कर पूर्व आदि
विशाल दिशाओं को जीतो. तेजस्वी होने के कारण सारी प्रजाएं तुम्हारी कामना करें तथा
दिव्य जल तुम्हारे राज्य को प्राप्त हो, जिस से तुम्हारे राज्य में अकाल न पड़े. (४)
या आपो दिव्याः पयसा मदन्त्यन्तरिक्ष उत वा पृथिव्याम्.
तासां त्वा सर्वासामपामभि षिञ्चामि वर्चसा.. (५)
हे राजा! आकाश से बरसने वाले जो जल अपने रस से, प्राणियों को तृप्त करते हैं,
अंतरिक्ष और पृथ्वी पर जो जल स्थित हैं, मैं तीनों लोकों में स्थित इन जलों से तुम्हारा
अभिषेक करता हूं. (५)
अभि त्वा वर्चसासिचन्नापो दिव्याः पयस्वतीः.
यथासो मित्रवर्धनस्तथा त्वा सविता करत्.. (६)
हे राजा! दिव्य जल अपने तेज से तुम्हें सींचे, जिस से तुम मित्रों के बढ़ाने वाले बनो.
सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव तुम्हें सामर्थ्य दें. (६)
एना व्याघ्रं परिषस्वजानाः सिंहं हिन्वन्ति महते सौभगाय.
समुद्रं न सुभुवस्तस्थिवांसं मर्मृज्यन्ते द्वीपिनमप्स्व १ न्तः.. (७)
नदी के रूप में जल जिस प्रकार सागर को प्रसन्न करते हैं, उसी प्रकार दिव्य जल राजा
को शक्तिशाली बनाएं. जिस प्रकार माता पुत्र का आलिंगन करती है, उसी प्रकार महान
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