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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 163

आ तिष्ठ मित्रवर्धन तुभ्यं देवा अधि ब्रुवन्.. (२)
हे राजा! तुम सिंहासन तथा हाथी, रथ, घोड़ा आदि सवारियों के प्रति अनिच्छा मत
करो. तुम शक्तिशाली एवं कार्य अकार्य का ज्ञान रखने वाले हो. तुम शत्रु हंता हो,
राजसिंहासन पर बैठ कर तुम मित्रों का कल्याण करो. इंद्र आदि देव तुम्हें अपना कहें. (२)
आतिष्ठन्तं परि विश्वे अभूषञ्छ्रियं वसानश्चरति स्वरोचिः.
महत् तद् वृष्णो असुरस्य नामा विश्वरूपो अमृतानि तस्थौ.. (३)
सिंहासन पर बैठे हुए राजा की सब लोग सेवा करें. राजा भी सिंहासन पर बैठ कर
राज्यलक्ष्मी को धारण करे, तेजस्वी बने तथा प्रजा पालन में तत्पर हो. अभिषेक से उत्पन्न
राज्यतेज दसों दिशाओं में फैल जाए. शत्रुओं को दूर भगाने वाले राजा के नाममात्र से शत्रु
भयभीत होने लगें. यह राजा शत्रु, मित्र, पत्नी आदि के प्रति विविध प्रकार का व्यवहार करता
हुआ दंड, युद्ध, अध्ययन आदि कर्म करे. (३)
व्याघ्रो अधि वैयाघ्रे वि क्रमस्व दिशो महीः.
विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्त्वापो दिव्याः पयस्वतीः.. (४)
हे राजा! तुम व्याघ्रचर्म पर बैठ कर और बाघ के समान अपराजेय हो कर पूर्व आदि
विशाल दिशाओं को जीतो. तेजस्वी होने के कारण सारी प्रजाएं तुम्हारी कामना करें तथा
दिव्य जल तुम्हारे राज्य को प्राप्त हो, जिस से तुम्हारे राज्य में अकाल न पड़े. (४)
या आपो दिव्याः पयसा मदन्त्यन्तरिक्ष उत वा पृथिव्याम्.
तासां त्वा सर्वासामपामभि षिञ्चामि वर्चसा.. (५)
हे राजा! आकाश से बरसने वाले जो जल अपने रस से, प्राणियों को तृप्त करते हैं,
अंतरिक्ष और पृथ्वी पर जो जल स्थित हैं, मैं तीनों लोकों में स्थित इन जलों से तुम्हारा
अभिषेक करता हूं. (५)
अभि त्वा वर्चसासिचन्नापो दिव्याः पयस्वतीः.
यथासो मित्रवर्धनस्तथा त्वा सविता करत्.. (६)
हे राजा! दिव्य जल अपने तेज से तुम्हें सींचे, जिस से तुम मित्रों के बढ़ाने वाले बनो.
सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव तुम्हें सामर्थ्य दें. (६)
एना व्याघ्रं परिषस्वजानाः सिंहं हिन्वन्ति महते सौभगाय.
समुद्रं न सुभुवस्तस्थिवांसं मर्मृज्यन्ते द्वीपिनमप्स्व १ न्तः.. (७)
नदी के रूप में जल जिस प्रकार सागर को प्रसन्न करते हैं, उसी प्रकार दिव्य जल राजा
को शक्तिशाली बनाएं. जिस प्रकार माता पुत्र का आलिंगन करती है, उसी प्रकार महान
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