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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 162

वि ते मदं मदावति शरमिव पातयामसि.
प्र त्वा चरुमिव येषन्तं वचसा स्थापयामसि.. (४)
हे मूर्च्छित करने वाली जड़ीबूटी! तेरे मूर्च्छा लाने वाले विष को मैं शरीर से इस प्रकार
दूर करता हूं, जिस प्रकार धनुष से छूटा हुआ बाण दूर गिरता है. हे विष! तू गुप्त रूप से जाने
वाले दूत के समान शरीर के अंगों में व्याप्त हो जाता है. मैं अपनी मंत्र शक्ति से तुझे शरीर से
निकाल कर दूर करता हूं. (४)
परि ग्राममिवाचितं वचसा स्थापयामसि.
तिष्ठा वृक्ष इव स्थामन्यभिखाते न रूरुप:.. (५)
हे खोदने से प्राप्त होने वाली जड़ीबूटी! जनसमूह के समान प्रभावशाली तेरे विष को
भी हम अपनी मंत्र शक्ति के द्वारा शरीर से निकाल कर दूर स्थापित करते हैं. तू अपने स्थान
पर वृक्ष के समान निश्चल रह तथा इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (५)
पवस्तैस्त्वा पर्यक्रीणन् दूर्शीभिरजिनैरुत.
प्रक्रीरसि त्वमोधे ऽ भ्रिखाते न रूरुप:.. (६)
हे विषमूलक जड़ीबूटी! महर्षियों ने तुझे झाड़ू के तिनकों के बदले खरीदा है. तू हरिण
आदि पशुओं के चर्म के बदले क्रय की गई है. तू बड़े परिश्रम से खरीदी गई है, इसलिए यहां
से दूर हो जा और इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (६)
अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे.
वीरान् नो अत्र मा दभन् तद् व एतत् पुरो दधे.. (७)
हे पुरुषो! तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करने वाले शत्रुओं ने पहले जो यज्ञ आदि कर्म किए
हैं, उन कर्मों के द्वारा वे हमारे पुत्र, पौत्र आदि को इस स्थान पर हिंसित न करें. किया जाता
हुआ यह चिकित्सा कर्म मैं उन की रक्षा के लिए तुम्हारे सामने उपस्थित करता हूं. (७)
सूक्त-८ देवता—जल
भूतो भूतेषु पय आ दधाति स भूतानामधिपतिर्बभूव.
तस्य मृत्युश्चरति राजसूयं स राजा राज्यमनु मन्यतामिदम्.. (१)
अभिषेक द्वारा ऐश्वर्य प्राप्त करने वाला राजा ही समृद्ध जनपदों में भोज्य सामग्री
पहुंचाता है. इस प्रकार वह प्राणियों का स्वामी हुआ. मृत्यु के देव यमराज दुष्टों को दंड
दिलाने और सज्जनों का पालन करने के लिए ही राजा का राजसूय यज्ञ कराते हैं. वह राजा
इस राज्य को तथा दुष्ट निग्रह और सज्जन परिपालन के कर्म को स्वीकार करे. (१)
अभि प्रेहि माप वेन उग्रश्चेत्ता सपत्नहा.
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