अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१० देवता—द्यावा
यश्चकार स निष्करत् स एव सुभिषक्तमः.
स एव तुभ्यं भेषजानि कृणवद् भिषजा शुचिः.. (५)
विधान को जानने वाले जिस महर्षि ने इस मणि का बंधन किया है, वह ग्रह विकार को
शांत करे. वही वैद्यों में सर्वोत्तम है. निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण
करें. (५)
सूक्त-१० देवता—द्यावा
क्षेत्रियात् त्वा निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (१)
हे व्याधि पीड़ित पुरुष! मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि रोगों से, रोग के कारण बने हुए पाप
देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण के पाप
से छुड़ाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं. (१)
शं ते अग्निः सहाद्भिरस्तु शं सोमः सहौषधीभिः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (२)
हे रोगी पुरुष! जलों के सहित अग्नि तेरे लिए सुखकर हो. सभी जड़ीबूटियों के साथ
सोमलता तेरे लिए सुखकारी हो. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने
हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण
देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों
तेरे लिए कल्याणकारी बनें. (२)
शं ते वातो अन्तरिक्षे वयो धाच्छं ते भवन्तु प्रदिशश्चतस्रः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (३)
हे रोगी पुरुष! धरती और आकाश के मध्य तेरे लिए पक्षियों को धारण करने वाली वायु
सुखकारी हो. पूर्व, पश्चिम आदि चारों उत्तम दिशाएं तेरे लिए सुखकारी हों. इसी प्रकार मैं तुझे
क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से, उत्पन्न पाप
से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप
रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों. (३)
इमा या देवीः प्रदिशश्चतस्रो वातपत्नीरभि सूर्यो विचष्टे.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (४)
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हे रोगी पुरुष! ये दिव्य एवं वायु पत्नी पूर्व आदि चारों दिशाएं एवं सब के प्रेरक सविता
सभी प्रकार तुम्हें सुखी करें. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए
पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से तथा वरुण देव
के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथिवी दोनों
तेरे लिए कल्याणकारी हों. (४)
तासु त्वान्तर्जरस्या दधामि प्र यक्ष्म एतु निर्ऋतिः पराचैः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (५)
हे रोगी पुरुष! मैं तुझे पूर्व आदि दिशाओं के मध्य वृद्धावस्था तक नीरोग रह कर जीवन
बिताने योग्य बनाता हूं. तेरा राजयक्ष्मा आदि रोग एवं पाप देवता निर्मित रोग तुझ से दूर चले
जाएं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों
के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं.
मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों.
(५)
अमुक्था यक्ष्माद् दुरितादवद्याद् द्रुहः पाशाद् ग्राह्याश्चोदमुक्थाः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (६)
हे रोगी पुरुष! तू यक्ष्मा रोग से छूट गया है. रोग के कारण बने हुए पाप से, निंदा से,
द्रोह से, वरुण के पाप से तू छूट गया है. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के
कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से
तथा वरुण देव के पाप से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और
पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों. (६)
अहा अरातिमविदः स्योनमप्यभूद्भद्रे सुकृतस्य लोके.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (७)
हे रोगी पुरुष! तूने शत्रु के समान बाधा पहुंचाने वाले रोग को त्याग दिया है एवं सुख
प्राप्त कर लिया है. उत्तम कर्मों के फल के रूप में प्राप्त होने वाले इस कल्याणमय भूलोक में
तू स्थित है. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़, आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप देवता से,
बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, देव, गुरु आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पाप से
छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए
कल्याणकारी हों. (७)
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सूर्यमृतं तमसो ग्राह्या अधि देवा मुञ्चन्तो असृजन्निरैनसः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (८)
हे रोगी पुरुष! सत्य बने हुए सूर्य अंधकार रूपी ग्रह से तुझे छुड़ाते हैं. इंद्र आदि देव तुझे
पाप से मुक्त करते हैं. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग का कारण बने हुए पाप
देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से, वरुण देव के पाप
से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र के द्वारा तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए
कल्याणकारी हों. (८)
सूक्त-११ देवता—मंत्रों में बताए गए
दूष्या दूषिरसि हेत्या हेतिरसि मेन्या मेनिरसि.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (१)
हे तिलक वृक्ष से निर्मित मणि! विनाश करने वाली कृत्या का तू निवारण करती है. तू
युद्धों को नष्ट एवं वज्र को असफल करने वाली है. तू हम से अधिक शक्तिशाली शत्रु को
मारने के लिए पकड़ तथा हमारे समान शक्तिशाली शत्रु को छोड़ कर चली जा. (१)
सक्त्यो ऽ सि प्रतिसरो ऽ सि प्रत्यभिचरणो ऽ सि.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम... (२)
हे मणि! तू तिलक वृक्ष से निर्मित है. तू कृत्या आदि को भगाने वाला रक्षा सूत्र है. तू
दूसरों के द्वारा किए गए जादूटोनों का निवारण करने वाली है. तू मुझ से अधिक शक्तिशाली
शत्रु को मारने के लिए पकड़ तथा मेरे समान शक्तिशाली शत्रु को छोड़ कर आगे बढ़ जा. (२)
प्रति तमभि चर यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (३)
जो शत्रु हम से और हमारे पुत्रों, बांधवों तथा पशुओं से द्वेष करता है एवं हम जिस के
विनाश की इच्छा करते हैं, हे मणि! तुम इन दोनों प्रकार के शत्रुओं का विनाश करो. तुम मुझ
से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए पकड़ो तथा मेरे समान शक्ति वाले शत्रु को छोड़
कर आगे बढ़ जाओ. (३)
सूरिरसि वर्चोधा असि तनूपानो ऽ सि.
आप्रुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (४)
हे मणि! तू हमारे शत्रुओं द्वारा किए गए जादू टोनों को जानने वाली, तेजस्विनी एवं
हमारे शरीरों की रक्षा करने वाली है. तू हम से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए
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पकड़ एवं हमारे समान शक्ति वाले शत्रु को छोड़ कर आगे चली जा. (४)
शुक्रो ऽ सि भ्राजो ऽ सि स्वरसि ज्योतिरसि.
आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (५)
हे मणि! तू शत्रुओं को शोक में डुबाने वाली, तेजस्विनी, संताप देने वाली एवं ज्योति के
समान न छूने योग्य है. तू मुझ से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए पकड़ ले और मेरे
समान शक्ति वाले शत्रु को छोड़ कर आगे बढ़ जा. (५)
सूक्त-१२ देवता—द्यावा, पृथ्वी, अंतरिक्ष
द्यावापृथिवी उर्व १ न्तरिक्षं क्षेत्रस्य पत्न्युरुगायो ऽ द्भुत:.
उतान्तरिक्षमुरु वातगोपं त इह तप्यन्तां मयि तप्यमाने.. (१)
द्यावा और पृथ्वी के मध्य विस्तृत अंतरिक्ष विद्यमान है. इन तीनों लोकों के अधिपति देव
क्रमशः अग्नि, वायु और सूर्य हैं. ये अद्भुत एवं महापुरुषों द्वारा प्रशंसित विष्णु, ब्रह्मांड में
व्याप्त, आकाश, लोक एवं लोकाधिपति हैं. मुझ अभिचारकर्ता के दीक्षा नियमों के कारण
संतप्त होने पर संतप्त हों. तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मैं अपने शत्रु के विनाश हेतु तत्पर
हूं, उसी प्रकार ये देव भी उस के हिंसक बनें. (१)
इदं देवाः शृणुत ये यज्ञिया स्थ भरद्वाजो मह्यमुक्थानि शंसति.
पाशे स बद्धो दुरिते नि युज्यतां यो अस्माकं मन इदं हिनस्ति.. (२)
हे देवो! मेरा यह वचन सुनो, तुम सब यज्ञ के योग्य हो. भरद्वाज मुनि मेरी अभिलाषा
पूर्ति के लिए शास्त्रपाठ कर रहे हैं. जो शत्रु मेरे सन्मार्गगामी मन को कष्ट पहुंचाता है, वह मेरे
द्वारा किए गए जादूटोने के पाप में बंध कर मृत्यु रूपी दुर्गति को प्राप्त हो. (२)
इदमिन्द्र शृणुहि सोमप यत् त्वा हृदा शोचता जोहवीमि.
वृश्चामि तं कुलिशेनेव वृक्षं यो अस्माकं मन इदं हिनस्ति.. (३)
हे सोमरस के पीने से संतुष्ट मन वाले इंद्र, मेरे द्वारा कहे गए वाक्य को सुनो. मैं शत्रुओं
के द्वारा किए गए अपकारों से दुःखी मन के द्वारा तुम्हें बारबार बुला रहा हूं. जो मेरे मन को
इस प्रकार दुःखी कर रहे हैं, मैं उन शत्रुओं को उसी प्रकार काटता हूं, जिस प्रकार कुल्हाड़ी
वृक्ष को काटती है. (३)
अशीतिभिस्तिसृभिः सामगेभिरादित्येभिर्वसुभिरङ्गिारोभिः.
इष्टापूर्तमवतु नः पितॄणामामूं ददे हरसा दैव्येन.. (४)
तीन और अस्सी अर्थात् तिरासी सभा गायन कर्ताओं के, बारह आदमियों के, आठ
वसुओं के एवं दीर्घ सत्र का अनुष्ठान करने वाले अंगिरा गोत्रीय ऋषियों के सहयोग से हमारे
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पूर्वजों ने जो यज्ञ, कुआं एवं बाग से संबंधित उत्तम कर्म किए हैं, वे शत्रुओं से हमारी रक्षा
करें. हम अपकार करने वाले शत्रु को जादू टोने रूपी देवता के क्रोध के द्वारा अपने वश में
करते हैं. (४)
द्यावापृथिवी अनु मा दीधीथां विश्वे देवासो अनु मा रभध्वम्.
अङ्गिरसः पितरः सोम्यासः पापमार्थत्वपकामस्य कर्ता (५)
हे द्यावा पृथ्वी! तुम शत्रु को जीतने में मेरे अनुकूल बनो. हे समस्त देवो! तुम मेरे शत्रु
को पकड़ने के लिए तैयार हो जाओ. हे सोमरस के पात्र अंगिरा गोत्रीय ऋषियो एवं पितरो!
तुम ऐसा प्रयत्न करो कि मुझ से द्रोह करने वाले शत्रु मृत्यु को प्राप्त हों. (५)
अतीव यो मरुतो मन्यते नो ब्रह्म वा यो निन्दिषत् क्रियमाणम्.
तपूंषि तस्मै वृजिनानि सन्तु ब्रह्मद्विषं द्यौरभिसंतपाति.. (६)
हे मरुतो! जो शत्रु अपनेआप को हम से अधिक शक्तिशाली मानता है अथवा जो हमारे
द्वारा किए जाने वाले मंत्र संबंधी कर्म की निंदा करता है, उस के लिए संतापकारी आयुध
बाधक हों. मेरे कर्म से द्वेष करने वाले को द्यौ संताप दे. (६)
सप्त प्राणानष्टौ मन्यस्तांस्ते वृश्चामि ब्रह्मणा.
अया यमस्य सादनमग्निदूतो अरङ्कृतः.. (७)
हे शत्रु! तेरे सात प्राणों अर्थात् आंख, नाक, कान और मुंह के सात छिद्रों को तथा तेरे
कंठ की आठ धमनियों को मैं अपने मंत्र संबंधी अभिचार कर्म के द्वारा काटता हूं. छिन्न अंगों
वाला तू यमराज के घर जा. तेरे जलाने के लिए अग्नि दूत के समान आ गई है. इस के बाद
तेरे शव को सजाया जाएगा. (७)
आ दधामि ते पदं समिद्धे जातवेदसि.
अग्निः शरीरं वेवेष्ट्वसुं वागपि गच्छतु.. (८)
हे शत्रु! मैं जलती हुई अग्नि में तेरे कटे हुए चरणों के साथ तेरे पैरों की धूल फेंकता हूं.
अग्नि तेरे शरीर में प्रवेश कर के तेरे सारे अंगों में फैल जाए. तेरी वाणी और प्राण भी समाप्त
हो जाएं. (८)
सूक्त-१३ देवता—अग्नि, बृहस्पति, विश्वे
देव
आयुर्दा अग्ने जरसं वृणानो घृतप्रतीको घृतपृष्ठो अग्ने.
घृतं पीत्वा मधु चारु गव्यं पितेव पुत्रानभि रक्षतादिमम्.. (१)
हे अग्नि! तू इस ब्रह्मचारी को वृद्धावस्था तक आयु प्रदान कर. हे घृत के कारण
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प्रज्वलित एवं घृतरूपी रीढ़ वाले अग्नि देव! मधुर एवं निर्मल गोघृत से संतुष्ट हो कर तुम इस
ब्रह्मचारी की रक्षा उसी प्रकार करो, जिस प्रकार पिता पुत्र की रक्षा करता है. (१)
परि धत्त धत्त नो वर्चसेमं जरामृत्युं कृणुत दीर्घमायुः.
बृहस्पतिः प्रायच्छद् वास एतत् सोमाय राज्ञे परिधातवा उ.. (२)
हे देवो! इस ब्रह्मचारी को वस्त्र पहनाओ एवं हमारे तेज से इस का पोषण करो. इसे
ऐसा बनाओ कि वृद्धावस्था ही इस की मृत्यु बने. इस प्रकार इस की आयु को दीर्घ बनाओ.
बृहस्पति देव ने यह वस्त्र ब्राह्मणों के राजा सोम को पहनने के लिए दिया था. (२)
परीदं वासो अधिथाः स्वस्तये ऽ भूर्गृष्टीनामभिशस्तिपा उ.
शतं च जीव शरदः पुरूची रायश्च पोषमुपसंव्ययस्व.. (३)
हे विद्यार्थी! तुम ने यह वस्त्र क्षेम प्राप्त करने के हेतु धारण किया है. इसे धारण कर के
तुम हिंसा के भय से प्रजाओं की रक्षा करो. तुम अधिक समय तक पुत्र, पौत्र आदि को व्याप्त
करने वाले सौ वर्षों तक जीवित रहो एवं धन की पुष्टि धारण करो. (३)
एह्यश्मानमा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनूः.
कृण्वन्तु विश्वे देवा आयुष्टे शरदः शतम्.. (४)
हे ब्रह्मचारी! तू आ और अपने दाहिने पैर से पत्थर पर आक्रमण कर. तेरा शरीर पत्थर
के समान दृढ़ हो. समस्त देव तेरी आयु सौ वर्ष की बनाएं. (४)
यस्य ते वासः प्रथमवास्यं १ हरामस्तं त्वा विश्वे ऽ वन्तु देवाः.
तं त्वा भ्रातरः सुवृधा वर्धमानमनु जायन्तां बहवः सुजातम्.. (५)
हे ब्रह्मचारी! तुम ने नवीन वस्त्र धारण किया है. हम तुम से पहले पहना हुआ वस्त्र ले
रहे हैं. सभी देव तुम्हारी रक्षा करें. शोभन वृद्धि से बढ़ते हुए बहुत से भाई तुम्हारे बाद जन्म
लें. (५)
सूक्त-१४ देवता—अग्नि, भूतपति, इंद्र
निःसालां धृष्णुं धिषणमेकवाद्यां जिघत्स्वम्.
सर्वाश्चण्डस्य नप्त्यो नाशयामः सदान्वाः.. (१)
मैं शाल वृक्ष से भी ऊंची निःसाला नामक राक्षसी को नष्ट करता हूं. वह भय उत्पन्न
करने वाली, पराजित करने वाली, कठोर वचन बोलने वाली एवं मुझे खाने की इच्छुक है.
चंड नामक पापग्रह की सभी नातिनों को मैं नष्ट करता हूं, जो मुझ पर क्रोध करने वाली हैं.
(१)
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निर्वो गोष्ठादजामसि निरक्षान्निरुपानसात्.
निर्वो मगुन्द्या दुहितरो गृहेभ्यश्चातयामहे.. (२)
हे मगुंदी नाम की राक्षसी की पुत्रियो! मैं तुम्हें अपनी गोशाला से, जुए खेलने के स्थान
से तथा धान्य रखने के घर से दूर भगाता हूं. मैं तुम्हें अपने घरों से निकाल कर विशेष प्रकार
से नष्ट करता हूं. (२)
असौ यो अधराद् गृहस्तत्र सन्तवराय्यः.
तत्र सेदिर्न्युच्यतु सर्वांश्च यातुधान्यः.. (३)
यह जो अत्यधिक प्रसिद्ध पाताललोक है, कल्याण में विघ्न करने वाली राक्षसियां वहां
चली जाएं. पाप देवता निर्मित वहीं पाताल में नीचे चली जाएं. सभी राक्षसियां भी वहीं रहें.
(३)
भूतपतिर्निरजत्विन्द्रश्चैतः सदान्वाः.
गृहस्य बुध्न आसीनास्ता इन्द्रो वज्रेणाधि तिष्ठतु.. (४)
भूतों के स्वामी रुद्र और इंद्र क्रोध करने वाली राक्षसियों को मेरे घर से निकालें. इंद्र मेरे
घर के नीचे के भाग में निवास करने वाली पिशाचियों को वज्र से दबा कर रखें. (४)
यदि स्थ क्षेत्रियाणां यदि वा पुरुषेषिताः.
यदि स्थ दस्युभ्यो जाता नश्यतेतः सदान्वाः.. (५)
हे पिशाचियो! यदि तुम मातापिता के शरीर से आए हुए कोढ़, पागलपन, संग्रहणी
आदि का कारण बनी हुई हो अथवा तुम्हें मेरे शत्रुओं ने यहां भेजा है, यदि तुम चोर आदि के
समीप से प्रकाश में आई हो, तो तुम सब यहां से भाग जाओ. (५)
परि धामान्यासामाशुर्गाष्ठामिवासनम्.
अजैषं सर्वान् आजीन् वो नश्यतेतः सदान्वाः.. (६)
इन पिशाचियों के निवास स्थान पर मैं ने चारों ओर से इस प्रकार आक्रमण किया है,
जिस प्रकार तेज दौड़ने वाला घोड़ा अपनी घुड़साल की ओर जाता है. हे पिशाचियो! मैं ने
तुम सब को संग्राम में जीत लिया हैं. इस कारण तुम सब निराश्रित हो कर भाग जाओ. (६)
सूक्त-१५ देवता—प्राण
यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (१)
जिस प्रकार द्यौ और पृथ्वी न किसी से भयभीत और आशंकित होते हैं और न नष्ट होते
हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी शत्रु, ग्रह, रोग आदि से मत डरो. (१)
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यथाऽहश्च रात्री च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (२)
जिस प्रकार दिन और रात न किसी से भयभीत और आशंकित होते हैं तथा न नष्ट होते
हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी शत्रु, ग्रह, रोग आदि से मत डरो. (२)
यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (३)
जिस प्रकार सूर्य और चंद्र न किसी से भयभीत होते हैं, न आशंकित होते हैं और न नष्ट
होते हैं, हे मेरे प्राणो! इसी प्रकार तुम भी शत्रु, ग्रह, रोग आदि से डरो मत. (३)
यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (४)
जिस प्रकार ब्राह्मण और क्षत्रिय न किसी से भयभीत होते हैं, न आशंकित होते हैं और
न नष्ट होते हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी किसी से मत डरो. (४)
यथा सत्यं चानृतं च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (५)
जिस प्रकार सत्य और असत्य न किसी से भयभीत होते हैं, न आशंकित होते हैं और न
कभी नष्ट होते हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी मत डरो. (५)
यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (६)
जिस प्रकार वर्तमान का वस्तु समूह और भविष्य में उत्पन्न होने वाली वस्तुएं न किसी
से भयभीत होती हैं, न आशंकित होती हैं और न कभी नष्ट होती हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार
तुम भी किसी से मत डरो. (६)
सूक्त-१६ देवता—प्राण, अपान आदि
प्राणापानौ मृत्योर्मा पातं स्वाहा.. (१)
हे प्राण और अपान वायु के अभिमानी देवो! मृत्यु से मेरी रक्षा करो. यह हवि भलीभांति
हवन किया हुआ हो. (१)
द्यावापृथिवी उपश्रुत्या मा पातं स्वाहा.. (२)
हे द्यावा और पृथ्वी! मुझे सुनने की शक्ति दे कर मेरी रक्षा करो. यह हवि भलीभांति
हवन किया हुआ हो. (२)
सूर्य चक्षुषा मा पाहि स्वाहा.. (३)
सूर्य रूप देखने वाली इंद्रिय आंख के द्वारा मेरी रक्षा करे. यह हवि भलीभांति हवन
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किया हुआ हो. (३)
अग्ने वैश्वानर विश्वैर्मा देवैः पाहि स्वाहा.. (४)
हे वैश्वानर अग्नि! सभी देवों के साथ मेरी इंद्रियों को शक्ति प्रदान करके मेरी रक्षा करो.
यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (४)
विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि स्वाहा.. (५)
हे विश्वंभर! अपनी समस्त पोषण शक्ति के द्वारा मेरी रक्षा करो. यह हवि भलीभांति
हवन किया हुआ हो. (५)
सूक्त-१७ देवता—ओज आदि
ओजो ऽ स्योजो मे दाः स्वाहा.. (१)
हे अग्नि! तुम ओज हो. इसीलिए मुझ में ओज धारण करो. यह हवि भलीभांति हवन
किया हुआ हो. (१)
सहो ऽ सि सहो मे दाः स्वाहा.. (२)
हे अग्नि! तुम शत्रुओं को पराजित करने में समर्थ तेज हो, इसीलिए तुम मुझे तेज प्रदान
करो. यह हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (२)
बलमसि बलं मे दाः स्वाहा.. (३)
हे अग्नि! तुम बल हो, इसीलिए मुझे बल प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन किया
हुआ हो. (३)
आयुरस्यायुर्मे दाः स्वाहा.. (४)
हे अग्नि देव! तुम आयु हो, इसीलिए मुझे आयु प्रदान करो. यह हवि भलीभांति हवन
किया हुआ हो. (४)
श्रोत्रमसि श्रोत्रं मे दाः स्वाहा.. (५)
हे अग्नि देव! तुम श्रोत्र हो, इसीलिए मुझे श्रोत्र अर्थात् सुनने की शक्ति प्रदान करो. यह
हवि भलीभांति हवन किया हुआ हो. (५)
चक्षुरसि चक्षुर्मे दाः स्वाहा.. (६)
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