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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 81

यश्चकार स निष्करत् स एव सुभिषक्तमः.
स एव तुभ्यं भेषजानि कृणवद् भिषजा शुचिः.. (५)
विधान को जानने वाले जिस महर्षि ने इस मणि का बंधन किया है, वह ग्रह विकार को
शांत करे. वही वैद्यों में सर्वोत्तम है. निर्मल ज्ञान वाले वे ही वैद्य तेरे लिए ओषधियों का निर्माण
करें. (५)
सूक्त-१० देवता—द्यावा
क्षेत्रियात् त्वा निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (१)
हे व्याधि पीड़ित पुरुष! मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि रोगों से, रोग के कारण बने हुए पाप
देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण के पाप
से छुड़ाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हैं. (१)
शं ते अग्निः सहाद्भिरस्तु शं सोमः सहौषधीभिः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (२)
हे रोगी पुरुष! जलों के सहित अग्नि तेरे लिए सुखकर हो. सभी जड़ीबूटियों के साथ
सोमलता तेरे लिए सुखकारी हो. इसी प्रकार मैं तुझे क्षय, कोढ़ आदि से, रोग के कारण बने
हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से उत्पन्न पाप से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण
देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों
तेरे लिए कल्याणकारी बनें. (२)
शं ते वातो अन्तरिक्षे वयो धाच्छं ते भवन्तु प्रदिशश्चतस्रः.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (३)
हे रोगी पुरुष! धरती और आकाश के मध्य तेरे लिए पक्षियों को धारण करने वाली वायु
सुखकारी हो. पूर्व, पश्चिम आदि चारों उत्तम दिशाएं तेरे लिए सुखकारी हों. इसी प्रकार मैं तुझे
क्षय, कुष्ठ आदि से, रोग के कारण बने हुए पाप देवता से, बांधवों के आक्रोश से, उत्पन्न पाप
से, गुरु, देव आदि के द्रोह से एवं वरुण देव के पापों से छुड़ाता हूं. मैं अपने मंत्र से तुझे पाप
रहित बनाता हूं. द्यावा और पृथ्वी दोनों तेरे लिए कल्याणकारी हों. (३)
इमा या देवीः प्रदिशश्चतस्रो वातपत्नीरभि सूर्यो विचष्टे.
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्.
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (४)
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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित) · पृष्ठ 81, कुल 1063 में से · SarvaKosh