अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथाऽहश्च रात्री च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (२)
जिस प्रकार दिन और रात न किसी से भयभीत और आशंकित होते हैं तथा न नष्ट होते
हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी शत्रु, ग्रह, रोग आदि से मत डरो. (२)
यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (३)
जिस प्रकार सूर्य और चंद्र न किसी से भयभीत होते हैं, न आशंकित होते हैं और न नष्ट
होते हैं, हे मेरे प्राणो! इसी प्रकार तुम भी शत्रु, ग्रह, रोग आदि से डरो मत. (३)
यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (४)
जिस प्रकार ब्राह्मण और क्षत्रिय न किसी से भयभीत होते हैं, न आशंकित होते हैं और
न नष्ट होते हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी किसी से मत डरो. (४)
यथा सत्यं चानृतं च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (५)
जिस प्रकार सत्य और असत्य न किसी से भयभीत होते हैं, न आशंकित होते हैं और न
कभी नष्ट होते हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार तुम भी मत डरो. (५)
यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः. एवा मे प्राण मा बिभेः.. (६)
जिस प्रकार वर्तमान का वस्तु समूह और भविष्य में उत्पन्न होने वाली वस्तुएं न किसी
से भयभीत होती हैं, न आशंकित होती हैं और न कभी नष्ट होती हैं, हे मेरे प्राणो! उसी प्रकार
तुम भी किसी से मत डरो. (६)
सूक्त-१६ देवता—प्राण, अपान आदि
प्राणापानौ मृत्योर्मा पातं स्वाहा.. (१)
हे प्राण और अपान वायु के अभिमानी देवो! मृत्यु से मेरी रक्षा करो. यह हवि भलीभांति
हवन किया हुआ हो. (१)
द्यावापृथिवी उपश्रुत्या मा पातं स्वाहा.. (२)
हे द्यावा और पृथ्वी! मुझे सुनने की शक्ति दे कर मेरी रक्षा करो. यह हवि भलीभांति
हवन किया हुआ हो. (२)
सूर्य चक्षुषा मा पाहि स्वाहा.. (३)
सूर्य रूप देखने वाली इंद्रिय आंख के द्वारा मेरी रक्षा करे. यह हवि भलीभांति हवन
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