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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 84

पकड़ एवं हमारे समान शक्ति वाले शत्रु को छोड़ कर आगे चली जा. (४)
शुक्रो ऽ सि भ्राजो ऽ सि स्वरसि ज्योतिरसि.
आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम.. (५)
हे मणि! तू शत्रुओं को शोक में डुबाने वाली, तेजस्विनी, संताप देने वाली एवं ज्योति के
समान न छूने योग्य है. तू मुझ से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए पकड़ ले और मेरे
समान शक्ति वाले शत्रु को छोड़ कर आगे बढ़ जा. (५)
सूक्त-१२ देवता—द्यावा, पृथ्वी, अंतरिक्ष
द्यावापृथिवी उर्व १ न्तरिक्षं क्षेत्रस्य पत्न्युरुगायो ऽ द्भुत:.
उतान्तरिक्षमुरु वातगोपं त इह तप्यन्तां मयि तप्यमाने.. (१)
द्यावा और पृथ्वी के मध्य विस्तृत अंतरिक्ष विद्यमान है. इन तीनों लोकों के अधिपति देव
क्रमशः अग्नि, वायु और सूर्य हैं. ये अद्भुत एवं महापुरुषों द्वारा प्रशंसित विष्णु, ब्रह्मांड में
व्याप्त, आकाश, लोक एवं लोकाधिपति हैं. मुझ अभिचारकर्ता के दीक्षा नियमों के कारण
संतप्त होने पर संतप्त हों. तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मैं अपने शत्रु के विनाश हेतु तत्पर
हूं, उसी प्रकार ये देव भी उस के हिंसक बनें. (१)
इदं देवाः शृणुत ये यज्ञिया स्थ भरद्वाजो मह्यमुक्थानि शंसति.
पाशे स बद्धो दुरिते नि युज्यतां यो अस्माकं मन इदं हिनस्ति.. (२)
हे देवो! मेरा यह वचन सुनो, तुम सब यज्ञ के योग्य हो. भरद्वाज मुनि मेरी अभिलाषा
पूर्ति के लिए शास्त्रपाठ कर रहे हैं. जो शत्रु मेरे सन्मार्गगामी मन को कष्ट पहुंचाता है, वह मेरे
द्वारा किए गए जादूटोने के पाप में बंध कर मृत्यु रूपी दुर्गति को प्राप्त हो. (२)
इदमिन्द्र शृणुहि सोमप यत् त्वा हृदा शोचता जोहवीमि.
वृश्चामि तं कुलिशेनेव वृक्षं यो अस्माकं मन इदं हिनस्ति.. (३)
हे सोमरस के पीने से संतुष्ट मन वाले इंद्र, मेरे द्वारा कहे गए वाक्य को सुनो. मैं शत्रुओं
के द्वारा किए गए अपकारों से दुःखी मन के द्वारा तुम्हें बारबार बुला रहा हूं. जो मेरे मन को
इस प्रकार दुःखी कर रहे हैं, मैं उन शत्रुओं को उसी प्रकार काटता हूं, जिस प्रकार कुल्हाड़ी
वृक्ष को काटती है. (३)
अशीतिभिस्तिसृभिः सामगेभिरादित्येभिर्वसुभिरङ्गिारोभिः.
इष्टापूर्तमवतु नः पितॄणामामूं ददे हरसा दैव्येन.. (४)
तीन और अस्सी अर्थात् तिरासी सभा गायन कर्ताओं के, बारह आदमियों के, आठ
वसुओं के एवं दीर्घ सत्र का अनुष्ठान करने वाले अंगिरा गोत्रीय ऋषियों के सहयोग से हमारे
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