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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

९० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३

Page 100Permalink

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९० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३


[बायाँ स्तम्भ / Sanskrit Text]
स एष प्रज्ञानरूप आत्मा
ब्रह्मापरं सर्वशरीरस्थः प्राणः
प्रज्ञात्मा। अन्तःकरणोपाधिष्वनु-
प्रविष्टो जलभेदगतसूर्यप्रतिविम्ब-
वद्धिरण्यगर्भः प्राणः प्रज्ञात्मा ।
एष एव इन्द्रो गुणाद्देवराजो वा ।
एष प्रजापतिर्यः प्रथमजः शरीरी।
यतो मुखादिनिर्भेदद्वारेणाग्न्या-
दयो लोकपाला जाताः स प्रजा-
पतिरेष एव । येऽप्येतेऽग्न्यादयः
सर्वे देवा एष एव ।
इमानि च सर्वशरीरोपादान-
भूतानि पञ्च पृथिव्यादीनि महा-
भूतान्यन्नान्नादत्वलक्षणान्येतानि,
किंचेमानि च क्षुद्रमिश्राणि क्षुद्रै-
रल्पकैर्मिश्राणि, इवशब्दोऽन-
र्थकः, सर्पादीनि बीजानि कार-
णानीतराणि चेतराणि च द्वैरा-
श्येन निर्दिश्यमानानि ।


[दायाँ स्तम्भ / Hindi Commentary]
वह यह प्रज्ञानरूप आत्मा ही
अपरब्रह्म है, अर्थात् सम्पूर्ण शरीरोंमें
स्थित प्राण-प्रज्ञात्मा है । विभिन्न
जलपात्रोंमें पड़े हुए प्रतिबिम्बके
समान यही अन्तःकरणरूप
उपाधियोंमें अनुप्रविष्ट हिरण्यगर्भ—
प्राण यानी प्रज्ञात्मा है । यही
[ 'इदमदर्शम्' इस श्रुतिमें बतलाये
हुए ] गुणके कारण इन्द्र अथवा
देवराज है । यही प्रजापति है, जो
सबसे पहले उत्पन्न हुआ देहधारी
है । जिससे मुखादिनिर्भेदके द्वारा
अग्नि आदि लोकपाल उत्पन्न हुए हैं
वह प्रजापति भी यही है । और भी
ये जो अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता हैं
वे भी यही हैं ।
ये जो समस्त शरीरोंके उपादान-
भूत एवं अन्न और अन्नादत्वभावको
प्राप्त हुए पृथिवी आदि पञ्च भूत हैं,
क्षुद्र यानी अल्प जीवोंके सहित
जो सर्पादि हैं तथा बीज—
कारण और इतर—कार्यवर्ग इस
प्रकार अलग-अलग दो विभागोंसे
निर्दिष्ट [ समस्त प्राणी हैं वे भी यही
हैं ] । [ 'क्षुद्रमिश्राणीव' इस
पदसमूहमें ] 'इव' शब्दका प्रयोग
अनर्थक है ।