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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

६२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

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६२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

[वाम भाग / संस्कृत मूल]
मन्तव्यस्तदा येन च मन्तव्यः
आत्मा आत्मना यश्च मन्तव्य
आत्मा तौ द्वौ प्रसज्येयाताम् ।
एक एवात्मा द्विधा मन्तृमन्तव्य-
त्वेन द्विशकलीभवेद्वंशादिवत् ।
उभयथाप्यनुपपत्तिरेव । यथा
प्रदोपयोः प्रकाश्यप्रकाशकत्वा-
नुपपत्तिः समत्वात्तद्वत् ।
न च मन्तुर्मन्तव्ये मननव्या-
पारशून्यः कालोऽस्त्यात्ममन-
नाय । यदापि लिङ्गेनात्मानं
मनुते मन्ता; तदापि पूर्ववदेव
लिङ्गेन मन्तव्य आत्मा यश्च
तस्य मन्ता तौ द्वौ प्रसज्येया-
ताम् । एक एव वा द्विधेति-
पूर्वोक्तदोषः । न प्रत्यक्षेण
नाप्यनुमानेन ज्ञायते चेत् कथ-
मुच्यते “स म आत्मेति विद्यात्”
(कौषी० ३।९) इति ? कथं
वा श्रोता मन्तेत्यादि ?

[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]
आत्माद्वारा ही मन्तव्य माना जाय
तो जिस आत्मासे आत्मा मनन
किया जाता है और जिस आत्माका
मनन किया जाता है उनके दो होने-
का प्रसंग उपस्थित हो जायगा ।
अथवा बाँस आदिके समान एक ही
आत्मा मन्ता और मन्तव्यरूपसे दो
भागोंमें विभक्त माना जायगा। किन्तु
उपर्युक्त दोनों प्रकारसे अनुपपत्ति
ही है। जैसे कि समानरूप होनेके
कारण दो दीपकोंका परस्पर प्रकाश्य-
प्रकाशकत्व नहीं बन सकता, उसी
प्रकार [ यहाँ समझना चाहिये ] ।
इसके सिवा मन्ताको अपना
मनन करनेके लिये मन्तव्य पदार्थों-
का मनन करनेके व्यापारसे रहित
कोई काल भी नहीं है। जिस समय
भी किसी लिङ्गके द्वारा मन्ता अपना
मनन करता है उस समय भी पहले-
हीके समान लिङ्गसे मन्तव्य आत्मा
और जो कोई उसका मनन करने-
वाला है वे दो सिद्ध होते हैं; अथवा
एक ही दो भागोंमें विभक्त है-इस
प्रकार पूर्वोक्त दोष उपस्थित हो
जाता है। और यदि वह न प्रत्यक्ष-
से जाना जाता है और न अनुमानसे
तो ऐसा क्यों कहते हैं कि “वह
मेरा आत्मा है-ऐसा जाने” और
क्यों उसे श्रोता-मन्ता इत्यादि
बतलाते हैं ?

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
ननु श्रोतृत्ववादिधर्मवानात्मा, | पूर्व०-आत्मा तो श्रोतृत्ववादि
अश्रोतृत्वादि च प्रसिद्धमात्म- | धर्मवाला है और आत्माके अश्रोतृत्व
नः। किमत्र विषमं पश्यसि ? | आदि धर्म भी [ श्रुतिमें] प्रसिद्ध
| हैं। फिर इसमें तुम्हें विषमता क्या
| दिखलायी देती है ?
यद्यपि तव न विषमं तथापि | सिद्धान्ती-यद्यपि तुझे कोई
| विषमता ज्ञात नहीं होती, तथापि
मम तु विषमं प्रतिभाति । | मुझे तो होती ही है । किस
| प्रकार कि जिस समय यह श्रोता
कथम् ? यदासौ श्रोता तदा | होता है उस समय मन्ता नहीं
| होता और जब मन्ता होता है तब
न मन्ता यदा मन्ता तदा न | श्रोता नहीं होता । ऐसा होनेके
श्रोता । तत्रैवं सति पक्षे श्रोता | कारण वह एक पक्षमें श्रोता और
| मन्ता है तो दूसरे पक्षमें न श्रोता
मन्ता पक्षे न श्रोता नापि | है और न मन्ता ही है । ऐसा ही
| अन्यत्र (विज्ञाता आदिके सम्बन्धमें)
मन्ता । तथान्यत्रापि च । | भी समझना चाहिये ।
यदैवं तदा श्रोतृत्ववादिधर्म- | जब कि ऐसी बात है तब
| आत्मा श्रोतृत्ववादि धर्मवाला है अथवा
वानात्मा अश्रोतृत्वादिधर्मवा- | अश्रोतृत्वादि धर्मवाला ? इस प्रकार
न्वेति संशयस्थाने कथं तव | संशयस्थान उपस्थित होनेपर तुझे
| विषमता क्यों नहीं दिखायी देती ?
न वैषम्यम् । यदा देवदत्तो | जिस समय देवदत्त चलता है उस
गच्छति तदा न स्थाता | समय वह चलनेवाला ही होता है
| ठहरनेवाला नहीं होता, तथा जिस
गन्तैव । यदा तिष्ठति तदा | समय वह ठहरता है उस समय
| वह ठहरनेवाला ही होता है, चलने-
न गन्ता स्थातैव । तदा अस्य | वाला नहीं होता । ऐसी अवस्थामें
पक्ष एव गन्तृत्वं स्थातृत्वं | इसका गन्तृत्व और स्थातृत्व पाक्षिक