ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
५२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
५२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत]
नान्दनमिति दैर्घ्यं छान्दसम् ।
नन्दत्यनेन द्वारेण गत्वा पर-
स्मिन्ब्रह्मणीति ।
तस्यैवं सृष्ट्वा प्रविष्टस्य जीवे-
नात्मना राज्ञ इव पुरं त्रय
आवसथाः । जागरितकाल
इन्द्रियस्थानं दक्षिणं चक्षुः, स्वप्न-
कालेऽन्तर्मनः, सुषुप्तिकाले
हृदयाकाश इत्येतत् । वक्ष्यमाणा
वा त्रय आवसथाः; पितृशरीरं
मातृगर्भाशयः स्वं च शरीरमिति ।
त्रयः स्वप्ना जाग्रत्स्वप्नसुषु-
प्स्याख्याः । ननु जागरितं
प्रबोधरूपत्वान्न स्वप्नः; नैवम्,
स्वप्न एव । कथम् ? परमार्थ-
स्वात्मप्रबोधाभावात्स्वप्नवदसद्व-
स्तुदर्शनाच्च । अयमेवावसथश्चक्षु-
र्दक्षिणं प्रथमः, मनोऽन्तरं
द्वितीयः, हृदयाकाशस्तृतीयः ।
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
'नान्दनम्' इस पद [के नकार] में
दीर्घ वैदिक प्रक्रियाके अनुसार है।
तात्पर्य यह है कि इस मार्गसे
जाकर पुरुष परब्रह्ममें आनन्द प्राप्त
करने लगता है।
पुरमें प्रविष्ट हुए राजाके समान
इस प्रकार रचना करके उसमें
जीवरूपसे प्रवेश करनेवाले उस
ईश्वरके तीन आवसथ हैं—(१)
जाग्रत्कालमें इन्द्रियोंका स्थान
दक्षिण नेत्र, (२) स्वप्नकालमें
मनके भीतर और (३) सुषुप्तिमें
हृदयाकाशके अन्दर । अथवा आगे
बतलाये जानेवाले पितृदेह, मातृ-
गर्भाशय और अपना ही शरीर—ये
ही तीन आवसथ हैं।
तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति
नामक तीन स्वप्न हैं। यदि कहो
कि प्रबोधरूप होनेके कारण जाग्रत्
स्वप्न नहीं है, तो ऐसी बात नहीं
है; वह भी स्वप्न ही है। किस
प्रकार ? क्योंकि उस समय परमार्थ
आत्मस्वरूपके बोधका अभाव होता
है और स्वप्नके समान असत् वस्तुएँ
दिखलायी दिया करती हैं। [उन
आवसथोंमें] यह दक्षिण नेत्र ही
प्रथम है, मनका अन्तर्भाग द्वितीय
है और हृदयाकाश तृतीय है।
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
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अयमावसथ इत्युक्तानुकीर्त- | अयमावसथः [ ऐसा जो तीन
नमेव। तेषु ह्ययमावसथेषु पर्याये- | वार कहा गया है ] यह पूर्वकथित-
| का ही अनुकीर्तन है । उन
णात्मभावेन वर्तमानोऽविद्यया | आवसथोंमें क्रमशः आत्मभावसे
| रहनेवाला यह जीव दीर्घकालतक
दीर्घकालं गाढप्रसुप्तः स्वाभावि- | स्वाभाविक अविद्यासे गाढ निद्रामें
| सोता रहता है और अनेकों शत-
क्या न प्रबुध्यतेऽनेकशतसहस्रा- | सहस्र अनर्थोंकी प्राप्तिसे होनेवाले
| दुःखरूप मुद्गरोंके आघातके अनुभव-
नर्थसंनिपातजदुःखमुद्गराभिघा- | से भी नहीं जगता ॥ १२ ॥
तानुभवैरपि ॥१२॥ |
❧ जीवका मोह और उसकी निवृत्ति ❧
स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् किमिहान्यं वावदिष-
दिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् । इदम-
दर्शमिती ३ ॥ १३ ॥
[ इस प्रकार शरीरमें प्रवेश करके जीवरूपसे ] उत्पन्न हुए उस
परमेश्वरने भूतोंको [ तादात्म्यभावसे ] ग्रहण किया । और [ गुरुकृपासे
बोध होनेपर ] 'यहाँ [ मेरे सिवा ] अन्य कौन है' ऐसा कहा । और
मैंने इसे ( अपने आत्मस्वरूपको ) देख लिया है इस प्रकार उसने इस
पुरुषको ही पूर्णतम ब्रह्मरूपसे देखा ॥ १३ ॥
स जातः शरीरे प्रविष्टो जी- | उसने उत्पन्न होकर—जीवभावसे
| शरीरमें प्रविष्ट होकर भूतोंको
वात्मना भूतान्यभिव्यैख्यद्व्या- | व्याकृत किया [ अर्थात् उन्हें
| तादात्म्यरूपसे ग्रहण किया ] । फिर
करोत् । स कदाचित्परमकारु- | किसी समय परम कारुणिक आचार्य-
| के द्वारा अपने कर्णमूलमें—जिसका
णिकेनाचार्येणात्मज्ञानप्रबोधकृ- | शब्द आत्मज्ञानका दृढ़ बोध कराने-