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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७

Page 47Permalink

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ।
ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥ २ ॥
उन देवताओंके लिये गौ ले आया। वे बोले—'यह हमारे लिये
पर्याप्त नहीं है।' [ फिर वह ] उनके लिये घोड़ा ले आया। वे बोले—
'यह भी हमारे लिये पर्याप्त नहीं है' ॥ २ ॥
ताभ्यो देव्ताभ्यो गां गवा- । उन देवताओंके लिये गौ-गौके
कृतिविशिष्टं पिण्डं ताभ्य एवा- आकारवाला पिण्ड पूर्ववत् उस
द्भ्यः पूर्ववत्पिण्डं समुद्धृत्य मूर्च्छ- जलसे निकालकर-अवयवोंकी
यित्वानयददर्शितवान् । ताः पुन- योजनाद्वारा रचकर लाया अर्थात्
उसे उन देवताओंको दिखलाया।
र्गवाकृतिं दृष्ट्वाब्रुवन्—न वै नो- उस गौके समान आकारवाले प्राणको
देखकर वे पुनः बोले 'यह पिण्ड हमारे
ऽस्मदर्थमधिष्ठानायान्नमत्तुमयं पि- लिये अन्न भक्षण करनेके निमित्त
ण्डोऽलं न वै । अलं पर्याप्तः, अत्तुं आश्रय बनानेके लिये पर्याप्त नहीं है।
'अलम्' का अर्थ पर्याप्त है। अर्थात्
न योग्य इत्यर्थः । गवि प्रत्या- [ यह आश्रय ] भोजन करनेके योग्य
नहीं है।' गौका परित्याग कर देनेपर
ख्याते ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रु- वह उनके लिये घोड़ा लाया। तब वे
'हमारे लिये यह भी पर्याप्त नहीं है'
वन्न वै नोऽयमलमिति पूर्ववत् ॥२॥ इस प्रकार पूर्ववत् कहने लगे ॥ २ ॥
मनुष्यशरीरकी उत्पत्ति और देवताओंद्वारा
उसकी स्वीकृति
सर्वप्रत्याख्याने— । इस प्रकार सबका त्याग कर
दिया जानेपर—
ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति ।
पुरुषो वाव सुकृतम् । ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति ॥३॥