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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९

Page 99Permalink

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
"प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति" | ऐसा ही कहा भी है-"प्राणन
(बृ० उ० १ । ४ । ७) | करनेके कारण ही [ब्रह्म] प्राण
इत्यादि ॥२॥ | नामवाला है" इत्यादि ॥ २ ॥
प्रज्ञानकी सर्वरूपता
एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि
च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषी-
त्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि
चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिजानि
चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किंचेदं प्राणि जङ्गमं च
पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने
प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥३॥
यह (प्रज्ञानरूप आत्मा) ही ब्रह्म है, यही इन्द्र है, यही प्रजापति
है, यही ये [अग्नि आदि] सारे देव तथा पृथिवी, वायु, आकाश, जल
और तेज-ये पाँच भूत हैं, यही क्षुद्र जीवोंके सहित उनके बीज
(कारण) और अन्य अण्डज, जरायुज, स्वेदज, उद्भिज, अश्व, गौ,
मनुष्य एवं हाथी है तथा [इनके अतिरिक्त] जो कुछ भी यह जङ्गम
(पैरसे चलनेवाले), पतत्रि (आकाशमें उड़नेवाले) और स्थावर (वृक्ष-
पर्वत आदि) रूप प्राणिवर्ग है वह सब प्रज्ञानेत्र और प्रज्ञान (निरुपा-
धिक चैतन्य) में ही स्थित है। लोक प्रज्ञानेत्र (प्रज्ञा-चैतन्य ही जिसका
नेत्र-व्यवहारका कारण है ऐसा) है, प्रज्ञा ही उसका लयस्थान है,
अतः प्रज्ञान ही ब्रह्म है ॥ ३ ॥
ऐतरेयो० ४-