ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
५० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
५० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
मिदं संहतानां वागादीनामभि- | होते हैं उसी प्रकार जिसके लिये
व्याहतादि, यथा स्तम्भकुड्या- | इन संघातस्वरूप वाणी आदिके
दीनां प्रासादादिसंहतानां स्वाव- | उच्चारणादि व्यापार हैं और जो इन
यवैरसंहतपरार्थत्वं तद्वदिति । | वाणी आदिके उच्चारणादिको 'इदम्'
इस प्रकार जानता है वह मैं सत्
और चेतनस्वरूप हूँ।
एवमीक्षित्वातः कतरेण | इस प्रकार विचारकर [ उसने
प्रपद्या इति । प्रपदं च मूर्धा चास्य | सोचा ] अतः मैं किस द्वारसे प्रवेश
संघातस्य प्रवेशमार्गौ । अनयोः | करूँ ? इस संघातमें प्रवेश करनेके
कतरेण मार्गेणेदं कार्यकारण- | दो मार्ग हैं-पदाग्र और मूर्धा ।
संघातलक्षणं पुरं प्रपद्यै प्रपद्ये- | इनमेंसे मैं किस मार्गसे इस कार्य-
येति ॥११॥ | करणके संघातस्वरूप पुरमें प्रवेश
करूँ ? ॥ ११ ॥
परमात्मका मूर्द्धद्वारसे शरीरप्रवेश
एवमीक्षित्वा न तावन्मद्- | इस प्रकार विचारकर परमेश्वरने
भृत्यस्य प्राणस्य मम सर्वार्थाधि- | निश्चय किया-'मैं सम्पूर्ण कार्योंके
कृतस्य प्रवेशमार्गेण प्रपदाभ्या- | अधिकारी अपने सेवक प्राणके प्रवेश-
मधः प्रपद्ये । किं तर्हि पारि- | मार्ग निम्नदेशीय चरणाग्रोंसे तो
शेष्यादस्य मूर्धानं विदार्य प्रपद्ये- | प्रवेश करूँगा नहीं। तो फिर
यमिति लोक इवेक्षितकारी- | किससे करूँगा ? अतः पदाग्रको
त्यागकर बचे हुए मूर्धाको ही विदीर्ण
करके प्रवेश करूँगा। इस प्रकार
सोच-समझकर काम करनेवाले लोगों-
के समान-
स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत ।
सैषा विद्दतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथा-