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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९

Page 59Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९


[वाम स्तम्भ / Left Column]

तस्मान्मया परेण स्वामिना-
धिष्ठात्रा कृताकृतफलसाक्षिभूतेन
भोक्त्रा भवितव्यं पुरस्येव
राज्ञा। यदि नामैतत्संहतकार्यस्य
परार्थत्वं परार्थिनं मां चेतनमन्त-
रेण भवेत्पुरपौरकार्यमिव तत्स्वा-
मिनम्, अथ कोऽहं किंस्वरूपः
कस्य वा स्वामी ?
यद्यहं कार्यकारणसंघातमनु-
प्रविश्य वागाद्यभिव्याहतादिफलं
नोपलभेय राजेव पुरमाविश्या-
धिकृतपुरुषकृताकृतावेक्षणम्; न
कश्चिन्मामयं सन्नेवंरूपश्चेत्यधि-
गच्छेद्विचारयेत् । विपर्यये तु
योऽयं वागाद्यभिव्याहतादीद-
मिति वेद, स सन्वेदनरूपश्चे-
त्यधिगन्तव्योऽहं स्याम्; यदर्थ-


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

अतः नगरके [अधिष्ठाता] राजाके
समान इस देहरूप संघातके परम प्रभु
और अधिष्ठाता मुझे भी इसके पाप-
पुण्यके फलके साक्षी और भोक्ता-
रूपसे स्थित होना चाहिये । यदि
इस देहेन्द्रियसंघातका कार्य परार्थ
(दूसरेके लिये) है और वह पुरस्वामी-
के बिना पुर और पुरवासियोंके कार्य-
के समान मुझ परार्थी अपने चेतन
रक्षकके बिना हो सकता है तो मैं
क्या रहा ? अर्थात् किस स्वरूपवाला
अथवा किसका स्वामी रहा ?
जिस प्रकार राजा नगरमें प्रवेश-
कर वहाँके अधिकारी पुरुषोंके कार्य-
अकार्यादिका निरीक्षण करता है
उसी प्रकार यदि मैं भी इस भूत
और इन्द्रियोंके संघातमें प्रवेश करके
वाणी आदिके उच्चारणादि फलको
ग्रहण न करूँगा तो कोई भी मुझे
'यह सत् है और ऐसे स्वरूपवाला है'
ऐसा अधिगम—विचार नहीं कर
सकेगा। इसके विपरीत अवस्थामें ही
मैं इस प्रकार जाना जा सकता हूँ
कि जिस प्रकार स्तम्भ और भित्ति
आदिसे मिलकर बने हुए मन्दिर
आदि संघात अपने अवयवोंके सहित
किसी अन्य असंहत वस्तुके लिये