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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

४६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

Page 56Permalink

४६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
तत्त्वचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्धै-
नत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ७ ॥
उसने इसे त्वचासे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह त्वचासे ग्रहण
न कर सका। यदि वह इसे त्वचासे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी
पुरुष ] अन्नको स्पर्श करके ही तृप्त हो जाया करता ॥ ७ ॥
तन्मनसाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्धै-
नन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ८ ॥
उसने इसे मनसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह मनसे ग्रहण न
कर सका। यदि वह इसे मनसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी
पुरुष ] अन्नका ध्यान करके ही तृप्त हो जाया करता ॥ ८ ॥
तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुं स
यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥
उसने इसे शिश्न ( लिङ्ग ) से ग्रहण करना चाहा; परन्तु वह
शिश्नसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे शिश्नसे ग्रहण कर
लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नका विसर्जन करके ही तृप्त हो
जाता ॥ ९ ॥
अपानद्वारा अन्नग्रहण
तदपानेनाजिघृक्षत्तदावयत् सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वा-
युरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥
फिर उसने इसे अपानसे ग्रहण करना चाहा और इसे ग्रहण कर
लिया। वह यह [ अपान ] ही अन्नका ग्रह (ग्रहण करनेवाला) है।
जो वायु अन्नायु (अन्नद्वारा जीवन धारण करनेवाला) प्रसिद्ध है वह यह
[ अपान ] वायु ही है ॥ १० ॥