ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
३८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
३८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
वह उनके लिये पुरुष ले आया। वे बोले—'यह सुन्दर बना है,
निश्चय पुरुष ही सुन्दर रचना है।' उन (देवताओं) से ईश्वरने कहा—
'अपने-अपने आयतन (आश्रयस्थानों) में प्रवेश कर जाओ' ॥ ३ ॥
ताभ्यः पुरुषमानयत्स्वयोनि- | [ वह ] उनके लिये उनका
भूतम् । ताः स्वयोनिं पुरुषं | योनिरूप पुरुष ले आया । अपने
दृष्ट्वा अखिन्नाः सत्यः सुकृतं | योनिभूत उस पुरुषको देखकर वे
शोभनं कृतमिदमधिष्ठानं बतेत्य- | खेदरहित हो इस प्रकार बोले—'यह
ब्रुवन् । तस्मात्पुरुषो वाव पुरुष | अधिष्ठान सुन्दर बना है । अतः
एव सुकृतं सर्वपुण्यकर्महेतुत्वात् । | सम्पूर्ण पुण्यकर्मोंका कारण होनेसे
स्वयं वा स्वेनैवात्मना स्वमायाभिः | निश्चय पुरुष ही सुकृत है । अथवा
कृतत्वात्सुकृतमित्युच्यते । | स्वयं अपने-आप अपनी ही मायासे
रचा होनेके कारण 'सुकृत' ऐसा
कहा जाता है ।
ता देवता ईश्वरोऽब्रवीदिष्ट- | ईश्वरने, यह समझकर कि इन्हें
मासामिदमधिष्ठानमिति मत्वा, | यह आश्रयस्थान प्रिय है, क्योंकि
सर्वे हि स्वयोनिषु रमन्ते, अतो | सभी अपनी योनिमें सन्तुष्ट रहा
यथायतनं यस्य यद्वदनादिक्रिया- | करते हैं, उन देवताओंसे कहा—
योग्यमायतनं तत्प्रविशतेति॥३॥ | 'जिसका जो आयतन है उस अपनी
सम्भाषणादि क्रियाके योग्य आयतन-
में तुम सब प्रविष्ट हो जाओ' ॥३॥
देवताओंका अपने-अपने आयतनोंमें प्रवेश
तथास्त्वित्यनुज्ञां प्रतिलभ्ये- | 'ऐसा ही हो' इस प्रकार
श्वरस्य नगर्यामिव बलाधिकृता- | राजाकी आज्ञा पाकर जिस प्रकार
दयः— | नगरीमें सेनाध्यक्षादि [ प्रवेश कर
जाते हैं उसी प्रकार ]—