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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

६६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

Page 76Permalink

६६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

र्मिणः संयोगजदृष्ट्याद्यनित्यधर्म- | रहित है उस ( आत्मा ) का संयोग-
वत्त्वं संभवति । तथा च श्रुतिः | जनित दृष्टि आदि अनित्य धर्मोंसे
“न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो | युक्त होना सम्भव नहीं है । ऐसी
विद्यते” ( बृ० उ० ४।३।२३ ) | ही “द्रष्टाकी दृष्टिका लोप नहीं
इत्याद्या । एवं तर्हि द्वे दृष्टी चक्षु- | होता” इत्यादि श्रुति भी है । इस
षोऽनित्या दृष्टिर्नित्या चात्मनः । | प्रकार दो दृष्टि सिद्ध होती हैं—
तथा च द्वे श्रुती श्रोत्रस्यानित्या | ( १ ) नेत्रकी अनित्य दृष्टि और ( २ )
नित्या चात्मस्वरूपस्य । तथा | आत्माकी नित्य दृष्टि । इसी प्रकार दो
द्वे मती विज्ञाती बाह्याबाह्ये एवं | श्रुति हैं—श्रोत्रकी अनित्य श्रुति और
ह्येव । तथा चेयं श्रुतिरूपपन्ना | आत्माकी नित्य श्रुति । तथा इसी
भवति “दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता” | प्रकार बाह्य और अबाह्यरूपसे दो मति
इत्याद्या । | और दो विज्ञाति हैं। ऐसी अवस्थामें
लोकेऽपि प्रसिद्धं चक्षुषस्ति- | ही “दृष्टिका द्रष्टा है, श्रुतिका श्रोता
मिरागमापाययोर्नष्टा दृष्टिर्जाता | है” इत्यादि श्रुति सार्थक हो
दृष्टिरिति चक्षुर्दृष्टेरनित्यत्वम्; | सकती है ।
तथा च श्रुतिमत्यादीनामात्म- | लोकमें भी तिमिर रोगकी उत्पत्ति
दृष्ट्यादीनां च नित्यत्वं प्रसिद्ध- | और विनाशसे ‘दृष्टि नष्ट हो गयी,
मेव लोके । वदति हि उद्घृतचक्षुः | दृष्टि उत्पन्न हो गयी’ इस प्रकार
स्वप्नेऽद्य मया भ्राता दृष्ट इति । | नेत्रकी दृष्टिका अनित्यत्व प्रसिद्ध ही
| है । इसी प्रकार श्रुति-मति इत्यादि-
| का [ अनित्यत्व माना गया है; ] और
| आत्माकी दृष्टि आदिका नित्यत्व तो
| लोकमें प्रसिद्ध ही है । जिसके नेत्र
| निकाल लिये गये हैं वह पुरुष भी
| ऐसा कहता ही है कि ‘आज
| स्वप्नमें मैंने अपने भाईको देखा था।’