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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

का ही संकल्प होनेके कारण आत्मस्वरूप ही है। द्वितीय अध्यायके

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का बोध करानेके लिये ही कही गयी है, क्योंकि समस्त संसार आत्मा-
का ही संकल्प होनेके कारण आत्मस्वरूप ही है। द्वितीय अध्यायके
आरम्भमें इसी प्रकार उपक्रम कर भगवान् भाष्यकारने आत्मतत्त्वका
बड़ा सुन्दर और युक्तियुक्त विवेचन किया है।
इस अध्यायमें आत्मज्ञानके हेतुभूत वैराग्यकी सिद्धिके लिये जीवकी
तीन अवस्थाओंका—जिन्हें प्रथम अध्यायमें 'आवसथ' नामसे कहा है—
वर्णन किया गया है। जीवके तीन जन्म माने गये हैं—(१) वीर्य-
रूपसे माताकी कुक्षिमें प्रवेश करना, (२) बालकरूपसे उत्पन्न होना
और (३) पिताका मृत्युको प्राप्त होकर पुनः जन्म ग्रहण करना।
'आत्मा वै पुत्र नामासि' (कौषी० २। ११) इस श्रुतिके अनुसार
पिता और पुत्रका अभेद है; इसीलिये पिताके पुनर्जन्मको भी पुत्रका
तृतीय जन्म बतलाया गया है। वामदेव ऋषिने गर्भमें रहते हुए ही
अपने बहुत-से जन्मोंका अनुभव बतलाया था और यह कहा था कि मैं
लोहमय दुर्गोंके समान सैकड़ों शरीरोंमें बंदी रह चुका हूँ,
किन्तु अब आत्मज्ञान हो जानेसे मैं श्येन पक्षीके समान उनका भेदन
कर बाहर निकल आया हूँ। ऐसा ज्ञान होनेके कारण ही वामदेव ऋषि
देहपातके अनन्तर अमरपदको प्राप्त हो गये थे। अतः आत्माको भूत
एवं इन्द्रिय आदि अनात्मप्रपञ्चसे सर्वथा असंग अनुभव करना ही
अमरत्व-प्राप्तिका एकमात्र साधन है।
इस प्रकार द्वितीय अध्यायमें आत्मज्ञानको परमपद-प्राप्तिका एक-
मात्र साधन बतलाकर तीसरे अध्यायमें उसीका प्रतिपादन किया गया
है। वहाँ बतलाया है कि हृदय, मन, संज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान,
मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति, स्मृति, संकल्प, क्रतु, असु,
काम एवं वश ये सब प्रज्ञानके ही नाम हैं। यह प्रज्ञान ही ब्रह्मा, इन्द्र,
प्रजापति, समस्त देवगण, पञ्चमहाभूत तथा उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और
जरायुज आदि सब प्रकारके जीव-जन्तु है। यही हाथी, घोड़े, मनुष्य
तथा सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत् है। इस प्रकार यह सारा संसार प्रज्ञानमें