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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

७२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

Page 82Permalink

७२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः संभूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति ।
तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनञ्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥१॥
सबसे पहले यह पुरुषशरीरमें ही गर्भरूपसे रहता है। यह जो
प्रसिद्ध रेतस् (वीर्य) है वह पुरुषके सम्पूर्ण अंगोंसे उत्पन्न हुआ तेज
(सार) है। पुरुष इस आत्मभूत तेजको अपने [ शरीर ] में ही पोषण
करता है। फिर जिस समय वह इसे स्त्रीमें सींचता है तब इसे [ गर्भ-
रूपसे ] उत्पन्न करता है। यह इसका पहला जन्म है ॥ १ ॥

[संस्कृत-भाष्य]
अयमेवाविद्याकामकर्माभिमा-
नवान् यज्ञादिकर्म कृत्वास्माल्लो-
काद् धूमादिक्रमेण चन्द्रमसं
प्राप्य क्षीणकर्मा वृष्ट्यादिक्रमे-
णेमं लोकं प्राप्य अन्नभूतः
पुरुषाग्नौ हुतः। तस्मिन्पुरुषे ह
वा अयं संसारी रसादिक्रमेण
आदितः प्रथमतः रेतोरूपेण
गर्भो भवतीत्येतदाह यदेतत्पु-
रुषे रेतस्तेन रूपेणेति।
तच्चैतद्रेतोऽन्नमयस्य पिण्डस्य
सर्वेभ्योऽङ्गेभ्योऽवयवेभ्यो रसा-
दिलक्षणेभ्यस्तेजः साररूपं शरी-
रस्य संभूतं परिनिष्पन्नं तत्पुरुष-

[हिन्दी-अनुवाद]
अविद्या, काम और कर्मजनित
अभिमानवाला यह जीव ही यज्ञादि
कर्म करके इस लोकसे धूमादि
क्रमसे चन्द्रलोकको प्राप्त हो कर्मोंके
क्षीण होनेपर वृष्टि आदि क्रमसे
इस लोकको प्राप्त होनेपर अन्नरूप-
से पुरुषरूप अग्निमें हवन किया
जाता है। उस पुरुषमें यह संसारी
जीव रसादि क्रमसे सबसे पहले
शुक्लरूपसे गर्भ होता है। इसी
बातको 'यह जो पुरुषमें रेतस् है
तद्रूपसे [गर्भ होता है]' इस
वाक्यसे कहा है।
वह यह रेतस् (शुक्र) अन्नमय
पिण्डके रसादिरूप सम्पूर्ण अङ्ग
यानी अवयवोंसे तेज-शरीरका
सारभूत निष्पन्न हुआ है। वह
पुरुषका आत्मभूत होनेके कारण