Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५

Page 65Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५
इसलिये उसका नाम 'इदन्द्र' हुआ, वह 'इदन्द्र' नामसे प्रसिद्ध
है। 'इदन्द्र' होनेपर ही [ ब्रह्मवेत्ता लोग ] उसे परोक्षरूपसे 'इन्द्र'
कहकर पुकारते हैं, क्योंकि देवगण परोक्षप्रिय ही होते हैं, देवता परोक्ष-
प्रिय ही होते हैं ॥ १४ ॥
तस्मादिदं पश्यतीतीदन्द्रो | इसलिये जो इसे देखता है वह
नाम परमात्मा । इदन्द्रो ह वै | परमात्मा 'इदन्द्र' नामवाला है ।
नाम प्रसिद्धो लोक ईश्वरः । | लोकमें ईश्वर 'इदन्द्र' नामसे
तमेवमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इति | प्रसिद्ध है। इस प्रकार 'इदन्द्र' होने-
परोक्षेण परोक्षाभिधानेनाचक्षते | पर भी ब्रह्मवेत्ता व्यवहारके लिये
ब्रह्मविदः संव्यवहारार्थं; पूज्यत- | उसे 'इन्द्र' इस परोक्ष नामसे
मत्वात्प्रत्यक्षनामग्रहणभयात् । | पुकारते हैं, क्योंकि पूज्यतम होनेके
तथा हि परोक्षप्रियाः परोक्षनाम- | कारण उसका प्रत्यक्ष नाम लेनेमें
ग्रहणप्रिया इव एव हि यस्मा- | उन्हें भय है। जब कि देवता लोग
देवाः; किमुत सर्वदेवानामपि | भी परोक्षप्रिय अर्थात् अपना परोक्ष
देवो महेश्वरः । द्विर्वचनं प्रकृता- | नाम ग्रहण किया जाना ही प्रिय
ध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥१४॥ | माननेवाले हैं तब सम्पूर्ण देवताओंके
| भी देव महेश्वरका तो कहना ही
| क्या है ? प्रकृत अध्यायकी समाप्ति
| सूचित करनेके लिये यहाँ दो बार
| कहा गया है ॥ १४ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये
तृतीयः खण्डः समाप्तः ॥ ३ ॥
उपनिषत्क्रमेण प्रथमः, आरण्यकक्रमेण
चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ।