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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९

Page 79Permalink

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९


[वाम स्तम्भ (मूल संस्कृत)]

वद्वेष्टयितुमिच्छति, सोपानमिव
च पद्भ्यामारोढुम्, जले खे च
मीनानां वयसां च पदं दिदृक्षते।
"नेति नेति" (बृ० उ० ३।९।
२६) "यतो वाचो निवर्तन्ते"
(तै० उ० २।४।१) इत्या-
दिश्रुतिभ्यः । "को अद्धा वेद"¹
(ऋ० सं० १। ३०। ६)
इत्यादिमन्त्रवर्णात् ।
कथं तर्हि तस्य स म आत्मेति
वेदनम्। ब्रूहि केन प्रकारेण तमहं
स म आत्मेति विद्याम् ।
अत्राख्यायिकामाचक्षते—क-
श्चित्किल मनुष्यो मुग्धः कैश्चि-
दुक्तः कस्मिंश्चिदपराधे सति
धिक्त्वां नासि मनुष्य इति ।
स मुग्धतया आत्मनो मनुष्यत्वं
प्रत्याययितुं कांचिदुपेत्याह ब्रवीतु
भवान्कोऽहमस्मीति । स तस्य
मुग्धतां ज्ञात्वाह । क्रमेण बोध-
यिष्यामीति । स्थावराद्यात्मभाव-


[दक्षिण स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद)]

समान लपेटना चाहता है और
अपने पैरोंसे उसपर सीढ़ियोंके
समान आरूढ़ होनेको उद्यत है ।
वह मानो जल और आकाशमें मछली
तथा पक्षियोंके चरणचिह्न देखनेको
उत्सुक है; जैसा कि "नेति नेति"
"यतो वाचो निवर्तन्ते" इत्यादि
श्रुतियों और "को अद्धा वेद"
इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है।
पूर्व०—तो फिर उसे 'वह मेरा
आत्मा है' इस प्रकार कैसे जाना
जाता है ? बतलाओ उसे मैं किस
प्रकारसे 'वह मेरा आत्मा है' इस
प्रकार जानूँगा ?
सिद्धान्ती—इस विषयमें एक
आख्यायिका कहते हैं, किसी मूढ
मनुष्यसे किसीने, उससे कोई
अपराध बन जानेपर, कहा—'तुझे
धिक्कार है, तू मनुष्य नहीं है।'
उसने मूढतावश अपना मनुष्यत्व
निश्चित करानेके लिये किसीके पास
जाकर कहा—'आप बतलाइये, मैं
कौन हूँ ?' वह उसकी मूर्खता
समझकर उससे बोला—'धीरे-धीरे
बतलाऊँगा।' और फिर स्थावरादिमें


[पाद-टिप्पणी]

१. उसे साक्षात् कौन जानता है ?