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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५

Page 45Permalink

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
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विक्षोभोत्थितानर्थशतमहोर्मौ म- | तृणारूप पवनके विक्षोभसे उठी
हारौरवाद्यनेकनिरयगतहाहेत्या- | हुई अनर्थरूप सैकड़ों उत्ताल तरंगें हैं,
दिक्कूजिताक्रोशनोद्भूतमहारवे | जहाँ महारौरव आदि अनेकों नरकोंके
सत्यार्जवदानदयाहिंसाशमदम- | 'हा हा' आदिक्रन्दन और चिल्लाहट
धृत्याद्यात्मगुणपाथेयपूर्णज्ञानोडुपे | से बड़ा कोलाहल मचा हुआ है,
सत्संगसर्वत्यागमार्गे मोक्षतीरे | जिसमें सत्य, सरलता, दान, दया,
एतस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन्पतित- | अहिंसा, शम, दम और धैर्य आदि
वत्यः। | आत्माके गुणरूप पाथेयसे भरी हुई
| ज्ञानरूप नौका है, सत्संग और
| सर्वत्याग ही जिसमें [ नौकाओंके
| आने-जानेका ] मार्ग है तथा मोक्ष
| ही जिसका तीर है—ऐसे [संसार-
| रूप] महासागरमें पतित हुए—गिरे।


तस्मादग्न्यादिदेवताप्यय- | अतः यहाँ यही अर्थ कहना इष्ट
लक्षणापि या गतिर्व्याख्याता | है कि ज्ञान और कर्मके समुच्चया-
ज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठानफलभूता | नुष्ठानकी फलस्वरूपा जिस अग्नि
सापि नालं संसारदुःखोपशमाय, | आदि देवतामें लीन होनारूप गतिकी
इत्ययं विवक्षितोऽर्थोऽत्र । यत | [ पूर्व अध्यायोंमें ] व्याख्या की गयी
एवं तस्मादेवं विदित्वा परं ब्रह्म | है वह भी सांसारिक दुःखकी
आत्मात्मनः सर्वभूतानां च यो | शान्तिके लिये पर्याप्त नहीं है।
वक्ष्यमाणविशेषणः प्रकृतश्च जग- | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये
दुत्पत्तिस्थितिसंहारहेतुत्वेन स | [ देवतालयरूप गति संसारदुःखकी
| शान्तिका उपाय नहीं है ] ऐसा
| जानकर जो परब्रह्म अपना और
| सब प्राणियोंका आत्मा है, जिसके
| विशेषण आगे बतलाये जानेवाले हैं
| और संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और
| संहारके कारणरूपसे जिसका यहाँ
| प्रकरण है उसे संसारके सम्पूर्ण