ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
७० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
७० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
मपोह्य न त्वममनुष्य इत्युक्त्वो- | उसके आत्मत्वका निषेध बतलाकर
परराम । स तं मुग्धः प्रत्याह | 'तू अमनुष्य नहीं है', ऐसा कहकर
भवान्मां बोधयितुं प्रवृत्तस्तूष्णीं | चुप हो गया । तब उस मूर्खने
बभूव किं न बोधयतीति ? तादृ- | उससे कहा-'आप मुझे समझानेके
ग्वेव तद्भवतो वचनम् । नास्य- | लिये प्रवृत्त होकर अब चुप हो गये,
मनुष्य इत्युक्तेऽपि मनुष्यत्वमा- | समझाते क्यों नहीं हैं ?' उसीके
त्मनो न प्रतिपद्यते यः स कथं | समान आपके ये वचन हैं । जो
मनुष्योऽसीत्युक्तोऽपि मनुष्यत्व- | पुरुष 'तू अमनुष्य नहीं है' ऐसा
मात्मनः प्रतिपद्येत ? | कहनेपर अपना मनुष्यत्व नहीं
तस्माद्यथाशास्त्रोपदेश एवा- | समझता वह 'तू मनुष्य है' ऐसा
त्मावबोधविधिर्नान्यः । न ह्यग्ने- | कहनेपर भी अपना मनुष्यत्व कैसे
र्दाह्यं तृणाद्यन्येन केनचिद्दग्धुं | समझ सकेगा ?
शक्यम् । अत एव शास्त्रमात्म- | अतः जैसा शास्त्रका उपदेश है
स्वरूपं बोधयितुं प्रवृत्तं सद- | उसके अनुसार ही आत्मसाक्षात्कार-
मनुष्यत्वप्रतिषेधेनैव "नेति | की विधि है, उससे भिन्न नहीं ।
नेति" (बृ० उ० ३।९।२६) | अग्निसे दग्ध होनेवाले तृण आदि
इत्युक्त्वोपरराम। तथा "अनन्त- | किसी अन्य वस्तुसे नहीं जलाये
रमबाह्यम्" (बृ० उ० २।५। | जा सकते । अतएव शास्त्र आत्म-
१९, ३।८।८) "अयमात्मा | स्वरूपका बोध करानेके लिये प्रवृत्त
ब्रह्म सर्वानुभूः" (बृ० उ० २।५। | होकर अमनुष्यत्वके प्रतिषेधके
१९) इत्यनुशासनम् । "तत्त्व- | समान “नेति-नेति” ऐसा कहकर
मसि" (छा० उ० ६।८-१६) | चुप हो गया है । इसी तरह
“यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन | "अन्तर्बाह्यभावसे रहित" “यह
| आत्मा सबका अनुभव करनेवाला
| ब्रह्म है" इत्यादि भी शास्त्रका
| उपदेश है । तथा “वह तू है”
| “जहाँ इसके लिये सब कुछ आत्मा
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
कं पश्येत्" (बृ० उ० २।४। | ही हो जाता है वहाँ किससे किसे
१४, ४।५।१५) इत्येवमा- | देखे ?" इत्यादि ऐसे ही और भी
द्यपि च। | वाक्य यही बतलाते हैं।
यावदयमेवं यथोक्तमिममा- | जबतक यह जीव उपर्युक्त
त्मानं न वेत्ति तावदयं बाह्या- | आत्माको 'यह ऐसा है' इस प्रकार
नित्यदृष्टिलक्षणमुपाधिमात्मत्वे- | नहीं जानता तबतक यह बाह्य
नोपेत्य अविद्यया उपाधिधर्मा- | अनित्य दृष्टिरूप उपाधिको आत्म-
नात्मनो मन्यमानो ब्रह्मादिस्तम्ब- | भावसे प्राप्त होकर अविद्यावश
पर्यन्तेषु देवतिर्यङ्नरस्थानेषु पुनः | उपाधिके धर्मोको आत्माके धर्म
पुनरावर्तमानोऽविद्याकामकर्मव- | मानता हुआ ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब-
शात्संसरति। स एवं संसरन्न्- | पर्यन्त देवता, पशु-पक्षी और
पात्तदेहेन्द्रियसंघातं त्यजति। | मनुष्योंकी योनियोंमें पुनः पुनः चक्कर
त्यक्त्वान्यमुपादत्ते। पुनः पुन- | लगाता हुआ अविद्या, कामना और
रेवमेव नदीस्रोतोवज्जन्ममरण- | कर्मके अधीन हो [जन्म-मरणरूप]
प्रबन्धाविच्छेदेन वर्तमानः का- | संसारको प्राप्त होता रहता है। वह
भिरवस्थाभिर्वर्तत इत्येतमर्थं द- | इस प्रकार संसारको प्राप्त होता
र्शयन्त्याह श्रुतिर्वैराग्यहेतोः— | हुआ प्राप्त हुए देह और इन्द्रियके
| संघातको त्याग देता है और एकको
| त्यागकर दूसरेको ग्रहण कर लेता
| है। वह इसी प्रकार नदीके स्रोतके
| समान जन्म-मरणकी परम्पराका
| विच्छेद न होते हुए किन अवस्थाओं-
| में रहता है इसी बातको, [मनुष्योंके
| मनमें] वैराग्य उत्पन्न करानेके लिये
| दिखलाती हुई श्रुति कहती है—
पुरुषका पहला जन्म
पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति। यदेतद्रेतः