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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

७६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

Page 86Permalink

७६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

ऽप्यूर्ध्वमग्रे जातमात्रमेव जातकर्म आदिसे संस्कार करता है
जातकर्मादिना यद्भावयति त- सो मानो अपना ही संस्कार करता
दात्मानमेव भावयति । पितुरा- है, क्योंकि पिताका आत्मा ही पुत्र
त्मैव हि पुत्ररूपेण जायते । तथा रूपसे उत्पन्न होता है। यही बात
ह्युक्तं "पतिर्जायां प्रविशति" "पतिर्जायां प्रविशति" इत्यादि
(हरि०३।७३।३१) इत्यादि । वाक्योंमें कही है ।
तत्किमर्थमात्मानं पुत्ररूपेण पिता अपनेको पुत्ररूपसे उत्पन्न
जनयित्वा भावयतीत्युच्यते— करके क्यों संस्कार करता है ?
एषां लोकानां सन्तत्या अविच्छे- इसपर कहते हैं-इन लोकोंके विस्तार
दायेत्यर्थः । विच्छिद्येरन्हीमे अर्थात् अविच्छेदके लिये । यदि कोई
लोकाः पुत्रोत्पादनादि यदि न पुत्रोत्पादनादि न करें तो ये लोक
कुर्युः केचन । एवं पुत्रोत्पाद- विच्छिन्न हो जायँ । इस प्रकार,
नादिकर्माविच्छेदेनैव सन्तताः क्योंकि पुत्रोत्पादनादि कर्मोंका
प्रबन्धरूपेण वर्तन्ते हि यस्मादिमे विच्छेद न होनेके कारण ही ये
लोकास्तस्मात्तदविच्छेदाय तत्क- लोक वृद्धिको प्राप्त होकर प्रवाहरूप-
र्तव्यं न मोक्षायेत्यर्थः । तदस्य से वर्तमान रहते हैं. इसलिये उनके
संसारिणः कुमाररूपेण मातुरुद- अविच्छेदके लिये उस [पुत्रो-
राद्यन्निर्गमनं तद्रेतोरूपापेक्षया त्पादनादि] को करना चाहिये;
द्वितीयं जन्म द्वितीयावस्थाभि- मोक्षके लिये नहीं-यह इसका
व्यक्तिः ॥ ३ ॥ अभिप्राय है । इस प्रकार कुमार-
रूपसे जो माताके उदरसे बाहर
निकलना है वही इस संसारी
जीवका, रेतोरूप जन्मकी अपेक्षा,
दूसरा जन्म यानी इसकी द्वितीय
अवस्थाकी अभिव्यक्ति है ॥ ३ ॥