ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
वामदेवकी उक्ति
एवं संसरन्नवस्थाभिव्यक्ति- | इस प्रकार संसरण करता [अर्थात्
| संसारमें उत्पन्न होता] हुआ और
त्रयेणं जन्ममरणप्रबन्धारूढः सर्वो | अवस्थाकी तीन अभिव्यक्तियोंके
| क्रमसे जन्म-मरणरूप परम्परापर
लोकः संसारसमुद्रे निपतितः | आरूढ़ हुआ सम्पूर्ण लोक संसार-
| समुद्रमें पड़ा-पड़ा जिस समय किसी
कथंचिद्यदा श्रुत्युक्तमात्मानं | प्रकार जिस-किसी अवस्थामें भी अपने
| श्रुतिप्रतिपादित आत्माको जान लेता
विजानाति यस्यां कस्यांचिद- | है उसी समय वह सम्पूर्ण संसार-
वस्थायां तदैव मुक्तसर्वसंसार- | बन्धनोंसे मुक्त होकर कृतकृत्य हो
बन्धनः कृतकृत्यो भवतीति- | जाता है-
तदुक्तमृषिणा—गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं
देवानां जनिमानि विश्वा । शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः
श्येनो जवसा निरदीयमिति । गर्भ एवैतच्छयानो
वामदेव एवमुवाच ॥ ५ ॥
यही बात ऋषि (मन्त्र) ने भी कही है—'मैंने गर्भमें रहते हुए ही इन
देवताओंके सम्पूर्ण जन्मोंको जान लिया है। [ तत्त्वज्ञान होनेसे पूर्व ]
मुझे सैकड़ों लोहमय ( लोहेके समान सुदृढ़ ) शरीरोंने अवरुद्ध किया
हुआ था। अब [ तत्त्वज्ञानके प्रभावसे ] मैं श्येन पक्षीके समान [ उनका
छेदन करके ] बाहर निकल आया हूँ'—वामदेवने गर्भमें शयन करते
समय ही ऐसा कहा था ॥ ५ ॥
एतद्वस्तु तदृषिणा मन्त्रेणा- | यही बात ऋषि यानी मन्त्रने
प्युक्तमित्याह— | भी कही है, सो बतलाते हैं—
गर्भे नु मातुर्गर्भाशय एव | 'गर्भे नु'—माताके गर्भमें
सन् । न्विति वितर्के । अनेक- | रहते हुए ही—यहाँ 'नु' शब्द