ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
८४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३
८४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३
तुमर्हति । योज्ञोपास्यः कः स | सकता है । इनमें जो उपासनीय
आत्मेति विशेषनिर्धारणार्थं पुन- | है वह आत्मा कौन-सा है ? इस
रन्योन्यं पप्रच्छुर्विचारयन्तः । | विशेष बातको निश्चय करनेके लिये
| उन्होंने आपसमें विचार करते हुए
| एक-दूसरेसे फिर पूछा ।
पुनस्तेषां विचारयतां विशेष- | फिर आपसमें विचार करनेवाले
| उन मुमुक्षुओंको अपने विचारणीय
विचारणास्पदविषया मतिरभूत् । | विशेष विषयके सम्बन्धमें यह बुद्धि
| पैदा हुई । किस प्रकार पैदा हुई ?
कथम् ? द्वे वस्तुनी अस्मिन् पिण्ड | [सो बतलाते हैं ]-इस पिण्डमें
| दो वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं-एक तो
उपलभ्येते । अनेकभेदभिन्नेन | जिस चक्षु आदि अनेक प्रकारके
| भेदोंसे विभिन्न साधन (इन्द्रियग्राम)
करणेन येनोपलभते । यश्चैक | द्वारा [पुरुष विषयोंको] उपलब्ध
| करता है और दूसरा जो उपलब्ध
उपलभते । करणान्तरोपलब्ध- | किया करता है, क्योंकि वह भिन्न-
विषयस्मृतिप्रतिसन्धानात् । तत्र | भिन्न इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध हुए
| विषयोंकी स्मृतिका अनुसन्धान
न तावद्येनोपलभते स आत्मा | करता है। उनमेंसे जिसके द्वारा पुरुष
| उपलब्ध करता है वह तो आत्मा
भवितुमर्हति । | हो नहीं सकता ।
केन पुनरुपलभत इत्युच्यते | तो फिर वह किसके द्वारा उपलब्ध
येन वा चक्षुर्भूतेन रूपं पश्यति । | करता है, सो बतलाया जाता है—
| नेत्रके साथ एकीभूत हुए जिस
येन वा शृणोति श्रोत्रभूतेन शब्दम्, | आत्मासे वह रूपको देखता है, जिस
येन वा घ्राणभूतेन गंधानाजि- | श्रोत्रभावापन्नके द्वारा वह शब्द श्रवण
घ्रति, येन वा वाक्करणभूतेन वाचं | करता है, जिस घ्राणेन्द्रियभूतसे वह
| गन्धोंको सूँघता है, जिस वागिन्द्रिय-
नामात्मिकां व्याकरोति गौरश्व | भूतसे वह गौ-अश्व इत्यादि नामात्मिका
इत्येवमाद्यां साध्वसाध्विति च, | तथा साधु-असाधु वाणीका विश्लेषण