ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
ऋग्वेदीय ऐतरेयारण्यकान्तर्गत द्वितीय आरण्यकके अध्याय ४, ५
श्रीहरिः
प्रस्तावना
ऋग्वेदीय ऐतरेयारण्यकान्तर्गत द्वितीय आरण्यकके अध्याय ४, ५
और ६ का नाम ऐतरेयोपनिषद् है। यह उपनिषद् ब्रह्मविद्याप्रधान है।
भगवान् शंकराचार्यने इसके ऊपर जो भाष्य लिखा है वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण
है। इसके उपोद्घात-भाष्यमें उन्होंने मोक्षके हेतुका निर्णय करते हुए
कर्म और कर्मसमुच्चित ज्ञानका निराकरण कर केवल ज्ञानको ही उसका
एकमात्र साधन बतलाया है। फिर ज्ञानके अधिकारीका निर्णय किया है
और बड़े समारोहके साथ कर्मकाण्डीके अधिकारका निराकरण करते हुए
संन्यासीको ही उसका अधिकारी ठहराया है। वहाँ वे कहते हैं कि
'गृहस्थाश्रम' अपने गृहविशेषके परिग्रहका नाम है और यह कामनाओंके
रहते हुए ही हो सकता है तथा ज्ञानीमें कामनाओंका सर्वथा अभाव होता
है। इसलिये यदि किसी प्रकार चित्तशुद्धि हो जानेसे किसीको गृहस्था-
श्रममें ही ज्ञान हो जाय तो भी कामनाशन्य हो जानेसे अपने गृहविशेषके
परिग्रहका अभाव हो जानेके कारण उसे स्वतः ही भिक्षुकत्वकी प्राप्ति
हो जायगी। आचार्यका मत है कि 'यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति' आदि
श्रुतियाँ केवल अज्ञानियोंके लिये हैं; बोधवान्के लिये इस प्रकारकी कोई
विधि नहीं की जा सकती।
इस प्रकार विद्वान्के लिये पारिव्राज्यको अनिवार्यता दिखलाकर वे
जिज्ञासुके लिये भी उसकी अवश्यकर्तव्यताका विधान करते हैं। इसके
लिये उन्होंने 'शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः' 'अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं
प्रोवाच सम्यगृषिसंघजुष्टम्' 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके
अमृतत्वमानशुः' आदि श्रुति और 'ज्ञात्वा नैष्कर्म्यमाचरेत्' 'ब्रह्माश्रमपदे
वसेत्' आदि स्मृतियोंको उद्धृत किया है। ब्रह्मजिज्ञासु ब्रह्मचारीके लिये
भी चतुर्थाश्रमका विधान करते हुए आचार्य कहते हैं कि उसके विषयमें
[ २ ]
यह शंका नहीं की जा सकती कि उसे ऋणत्रयको निवृत्ति किये बिना
संन्यासका अधिकार नहीं है, क्योंकि गृहस्थाश्रमको स्वीकार करनेसे
पूर्व तो उसका ऋणी होना ही सम्भव नहीं है। अतः आचार्यका सिद्धान्त
है कि जिसे आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा है और जो साध्य-साधनरूप
अनित्य संसारसे मुक्त होना चाहता है, वह किसी भी आश्रममें हों उसे,
संन्यास ग्रहण करना ही चाहिये।
इस सिद्धान्तके मुख्य आधार दो ही हैं—(१) जिज्ञासुको
तो इसलिये गृहत्याग करना चाहिये कि उसके लिये गृहस्थाश्रममें रहते
हुए ज्ञानोपयोगिनी साधनसम्पत्तिको उपार्जन करना कठिन है और
(२) बोधवान्में कामनाओंका सर्वथा अभाव हो जाता है, इसलिये उसका
गृहस्थाश्रममें रहना सम्भव नहीं है। अतः ज्ञानोपयोगिनी साधन-
सम्पत्तिको उपार्जन करना तथा कामनाओंका अभाव—ये ही
गृहत्यागके मुख्य हेतु हैं। जो लोग घरमें रहते हुए ही शम-दमादि
साधनसम्पन्न हो सकते हैं और जिन बोधवानोंकी निष्कामतामें
अपने गृहविशेषमें रहना बाधक नहीं होता वे घरमें रहते हुए भी
ज्ञानोपार्जन और ज्ञानरक्षा कर ही सकते हैं। वे स्वरूपसे संन्यासी न
होनेपर भी वस्तुतः संन्यासधर्मसम्पन्न होनेके कारण आचार्यके मतका
ही अनुसरण करनेवाले हैं। अस्तु।
इस उपनिषद्में तीन अध्याय हैं। उनमेंसे पहले अध्यायमें तीन
खण्ड हैं तथा दूसरे और तीसरे अध्यायोंमें केवल एक-एक खण्ड है।
प्रथम अध्यायमें यह बतलाया गया है कि सृष्टिके आरम्भमें केवल एक
आत्मा ही था, उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। उसने लोक-
रचनाके लिये ईक्षण ( विचार ) किया और केवल संकल्पसे ही अम्भ,
मरीचि और मर—इन तीन लोकोंकी रचना की। इन्हें रचकर उस
परमात्माने उनके लिये लोकपालोंकी रचना करनेका विचार किया और
जलसे ही एक पुरुषकी रचनाकर उसे अवयवयुक्त किया। परमात्माके
सङ्कल्पसे ही उस विराट् पुरुषके इन्द्रिय, इन्द्रियगोलक और इन्द्रियाधिष्ठाता
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देव उत्पन्न हो गये। जब वे इन्द्रियाधिष्ठाता देवता इस महासमुद्रमें
आये तो परमात्माने उन्हें भूख-प्याससे युक्त कर दिया। तब उन्होंने
प्रार्थना की कि हमें कोई ऐसा आयतन प्रदान किया जाय जिसमें स्थित
होकर हम अन्न-भक्षण कर सकें। परमात्माने उनके लिये एक गौका
शरीर प्रस्तुत किया, किन्तु उन्होंने 'यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है' ऐसा
कहकर उसे अस्वीकार कर दिया। तत्पश्चात् घोड़ेका शरीर लाया गया
किन्तु वह भी अस्वीकृत हुआ। अन्तमें परमात्मा उनके लिये मनुष्यका
शरोर लाया। उसे देखकर सभी देवताओंने एकस्वरसे उसका अनु-
मोदन किया और वे सब परमात्माकी आज्ञासे उसके भिन्न-भिन्न अवयवों-
में वाक्, प्राण, चक्षु आदि रूपसे स्थित हो गये। फिर उनके लिये
अन्नकी रचना की गयी। अन्न उन्हें देखकर भगने लगा। देवताओंने
उसे वाणी, प्राण, चक्षु एवं श्रोत्रादि भिन्न-भिन्न करणोंसे ग्रहण करना
चाहा; परन्तु वे इसमें सफल न हुए। अन्तमें उन्होंने उसे अपानद्वारा
ग्रहण कर लिया। इस प्रकार यह सारी सृष्टि हो जानेपर परमात्माने
विचार किया कि अब मुझे भी इसमें प्रवेश करना चाहिये, क्योंकि मेरे
बिना यह सारा प्रपञ्च अकिञ्चित्कर ही है। अतः वह उस पुरुषकी
मूर्द्धसीमाको विदीर्णकर उसके द्वारा उसमें प्रवेश कर गया। इस
प्रकार जीवभावको प्राप्त होनेपर उसका भूतोंके साथ तादात्म्य हो जाता
है। पीछे जब गुरुकृपासे बोध होनेपर उसे अपने सर्वव्यापक शुद्ध
स्वरूपका साक्षात्कार होता है तो उसे 'इदम्'—इस तरह अपरोक्षरूप-
से देखनेके कारण उसकी 'इन्द्र' संज्ञा हो जाती है।
इस प्रकार ईक्षणसे लेकर परमात्माके प्रवेशपर्यन्त जो सृष्टिक्रम
बतलाया गया है, इसे ही विद्यारण्यस्वामीने ईश्वरसृष्टि कहा है।
'ईक्षणादिप्रवेशान्तः संसार ईशकल्पितः'। इस आख्यायिकामें बहुत-सी
विचित्र बातें देखी जाती हैं। यों तो मायामें कोई भी बात कुतूहलजनक नहीं
हुआ करती; तथापि आचार्यका तो कथन है कि यह केवल अर्थवाद है।
इसका अभिप्राय आत्मबोध करानेमें है। यह केवल आत्माके अद्वितीयत्व-