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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

५४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

Page 64Permalink

५४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

च्छब्दिकायां वेदान्तमहावाक्य- | वाला है ऐसी-वेदान्तवाक्यरूप महा-
भेर्यां तत्कर्णमूले ताड्यमानाया- | भेरीके बजाये जानेपर उसने, जिस-
मेतमेव सृष्ट्यादिकर्तृत्वेन प्रकृतं | का सृष्टि आदिके कर्तृत्वरूपसे प्रकरण
चला हुआ है उस पुरुष- [ शरीर-
पुरुषं पुरि शयानमात्मानं ब्रह्म | रूप ] पुरमें शयन करनेवाले आत्मा-
को ततम-इसमें एक तकारका लोप
वृहत्ततमं तकारेणैकेन लुप्तेन | हुआ है अतः तततम-व्याप्ततम
तततमं व्याप्ततमं परिपूर्णमाका- | अर्थात् आकाशके समान परिपूर्ण
महान् ब्रह्मरूपसे जाना-साक्षात्कार
शवत्प्रत्यबुध्यतापश्यत् । कथम् ? | किया । किस प्रकार साक्षात्कार
किया [ सो बतलाते हैं-] 'अहो !
इदं ब्रह्म ममात्मनः स्वरूपमदर्शं | मैंने अपने आत्माके स्वरूपको ही इस
ब्रह्मरूपसे देखा है' इस प्रकार ।
दृष्टवानस्मि, अहो इति, विचार- | यहाँ 'इती' पदमें जो प्लुत उच्चारण
है वह विचार प्रदर्शित करनेके लिये
णार्था प्लुतिः पूर्वम् ॥१३॥ | है ॥ १३ ॥

'इन्द्र' शब्दकी व्युत्पत्ति

यस्मादिदमित्येव यत्साक्षाद- | क्योंकि जो [ जीवरूपसे ] सबके
भीतर रहनेवाला है उस ब्रह्मको
परोक्षाद्ब्रह्म सर्वान्तरमपश्यत् | 'इदम् ( यह )' इस प्रकार साक्षात्
अपरोक्षरूपसे देखा था परोक्ष-
परोक्षेण- | रूपसे नहीं-

तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं
सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः
परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥