विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प ७
हर्ष रोमाञ्चित हो नाचने लगा । म्लेच्छ देश से १८ जहाज आये,
जिनका द्रव्य व्ययकर सेठ ने यह धर्म-प्रभावना की । इस प्रकार
जावडगाह ऋषभदेव, पुण्डरीक और कपर्दि यक्ष की मूर्त्तियाँ
विराजमान कर स्वर्ग का अतिथि वना । भगवान के दाहिनी ओर
पुण्डरीक स्वामी और वाँये तरफ जावड शाह द्वारा स्थापित दूसरा
विम्ब सुशोभित है ।
इक्ष्वाकु और यादव वंशी लोग यहाँ असंख्य कोटा-कोटि सिद्ध
हुए हैं जो 'कोटि-कोटि तिलक' नाम को सूचित करते हैं।
पाँचो पाण्डव, उनकी माता कुन्ती यहाँ से मुक्त हुए, यह इस
तोर्थ पर रही हुईटॉक पर लेप्यमय छहों मूर्त्तियाँ सिद्ध करती हैं ।
यहाँ श्रीसघ के अद्भुत भाग्य से रायण चैत्य वृक्ष चन्द्र-
किरणों से झरते अमृत के सदृश दुग्धवर्षा करता है । यहाँ व्याघ्री-
मयूर आदि तिर्यञ्च भी मुक्त भक्ति पूर्वक आदीश्वर भगवान के
चरणों को नमस्कार करने से स्वर्ग को प्राप्त हुए है । वाम पार्श्व मे
सत्यपुरीय महावीरावतार जिनालय और दक्षिण पार्श्व मे शकुनि
चैत्य के पृष्ठ भाग मे अष्टापद का मंदिर है। भव्य जन सरलता-
पूर्वक यात्रा कर पुण्य वृद्धि करे, इस हेतु से नन्दीश्वर, स्तंभनक
और गिरनार महातीर्थ के मन्दिर विराजमान हैं। अस्तिहस्त नमि
और विनमि से सेवित श्री नाभेय जिनेश्वर स्वर्गारोहण चैत्य में
शोभायमान हैं। दूसरे उत्तुग शिखर को श्रेयास, शान्तिनाथ,
नेमिनाथ, ऋषभदेव और महावीर आदि जिनेश्वर अलंकृत करते
है। पुण्यशाली जन यहाँ जिनालय में ससार का उच्छेद करने
वाली भगवती मरुदेवी को नमस्कार करके अपने आपको कृतकृत्य
मानते हैं ।
यहाँ कल्पवृक्ष सदृश कपर्दि नामक यक्षराज नमस्कार करने
वालो एव यात्रीसंघ के विविध विघ्नो का नाग करते है ।
यहाँ पर भगवान नेमिनाथ के आदेग से श्रीकृष्ण ने आठ