विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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मात्र से मनुष्यो के सिंह-अग्नि-समुद्र-साँप-भूपाल-विष-युद्ध-चोर-
वैरी-मारिजन्य भय नष्ट हो जाते हैं।
भरतेश्वर की बनवायी लेप्यमय आदिनाथ प्रतिमा का उत्संग
गय्यास्थ एव आत्मस्थ होकर ध्यान करने से सर्वभयो को जीतने
वाला होता है। उग्रतप व ब्रह्मचर्य से जो पुण्य की प्राप्ति होती है,
वही गत्रुञ्जय मे निवास करने से प्राप्ति होती है।
तीर्थों पर करोडो के व्यय से कामित आहार देने का पुण्यफल
यहाँ विमलाचल पर एक उपवास करने पर प्राप्त हो जाता है।
तीन लोक मे जो कुछ भी तीर्थ है—पुण्डरीक गिरि का अभिवदन-
दर्गन करने मात्र से उन सबके दर्गन हो जाते हैं।
सैकडो दानगालाओ मे भोजन होने पर भी यहाँ कभी अरिष्ट
पक्षी-कौए नही आते। यहाँ यात्रा पर जाते लोगोको भोजन देने पर
करोड गुणा पुण्य होता है और यात्रा करके लौटते हुए को भोजन
देने पर अनन्तगुणा पुण्य होता है।
विमलाचल को देखे विना भी सघ को प्रतिलाभ देने पर कोटि
गुणा पुण्य व देखने पर अनन्त गुणा पुण्य होता है।
इसी तीर्थ को वदन करने पर तीर्थंकरो के केवलज्ञान व
निर्वाण जहाँ हुए हैं, उन सभी तीर्थों की वदना हो जाती है।
जन्म-दीक्षा-ज्ञानोत्पत्ति-मोक्षगमन उत्सव दूसरे तीर्थों मे
पृथक्-पृथक् होते हैं किन्तु यहाँ सभी एक साथ होते है।
अयोध्या, मिथिला, चम्पा, श्रावस्ती, हस्तिनापुर, कौगाम्बी,
कागी, काकन्दी, कम्पिल, भद्दिलपुर, रत्नवाह—गौरीपुर, कुण्ड-
ग्राम, पावापुरी, चन्द्रानना, सिंहपुर, राजगृह, रैवतक, सम्मेत-
गिखर, वैभार, अष्टपदादि तीर्थों की यात्रा के फल से यहाँ की
यात्रा करने से सौ गुना फल होता है।
पूजा के पुण्य से सौ गुणा पुण्य, विम्बनिर्माण से एवं चैत्य
निर्माण से सहस्र गुणा व प्रतिपालन से अनन्त गुणा पुण्य होता है।