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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

रैवतगिरि-कल्प २१
देवी के पुत्र और गुर्जराधिपति श्री वीरधवल की राज्यधुरा को
चलाने वाले मन्त्रीश्वर वस्तुपाल तेजपाल नामक दो भ्राता हुए ।
उनमे तेजपाल मत्री ने गिरनार की तलहट्टी मे स्वनामाङ्कित
तेजलपुर नामक प्रवर गढ, मठ, प्रपा, मन्दिर और बाग-बगीचो से
सुन्दर बनवाया । वहाँ अपने पिता के नामाङ्कित 'आसराज
विहार' नामक पार्श्वनाथ जिनालय कराया । अपनी माता कुमार-
देवी के नाम से 'कुमर सरोवर' निर्माण करवाया । तेजलपुर के
पूर्व दिशा मे उग्रसेनगढ नामक दुर्ग मे युगादिनाथ-प्रमुख जिन-
मन्दिर सुशोभित है । उसके उग्रसेनगढ, खगारगढ और जूनागढ
तीन नाम प्रसिद्ध है । गढ के बाहर दक्षिण दिशा मे चँवरी-वेदी,
लड्डुओ के ओरे, पशुवाटक आदि स्थान है । उत्तर दिगा मे
विशाल स्तभ शाला गोभित दश दगार-मण्डप, गिरिद्वार मे पचम
हरि, दामोदर आदि स्थान स्वर्ण रेखा नदी के पार मे बर्त्तमान है ।
कालमेघ के समीप तेजपाल मत्री ने बहुत दिनो से नही आए
हुए सघ को बुलाकर उज्जयन्त शिखर पर एकत्र किया । वस्तु-
पाल मन्त्री ने शत्रुञ्जयावतार मन्दिर, अष्टापद-समेत शिखर मण्डप,
कपर्दियक्ष एव मरुदेवी प्रासाद कराये । तेजपाल मन्त्री ने तीन-
कल्याणक चैत्य कराया । देपाल मन्त्री ने इन्द्रमण्डप का उद्धार
कराया ।
ऐरावण गज-पद-मुद्रा अलकृत गजेन्द्रपद कुण्ड है, वहाँ अग
प्रक्षालन कर आये हुए यात्री लोग दुखो को जलाञ्जलि देते हैं ।
छत्रशिला के नीचे सहस्राम्रवनोद्यान है जहाँ यादवकुल-प्रदीप,
समुद्रविजय शिवादेवीनन्दन भगवान नेमिनाथ के दीक्षा केवल-
ज्ञान और निर्वाण कल्याणक हुए है । गिरिशिखर पर चढते ही
अम्बिका देवी का मन्दिर दिखाई देता है । वहाँ से अवलोकन
शिखर है, जहाँ पर स्थित होकर दशो दिशा से भगवान नेमिनाथ