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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

श्री स्तम्भन पार्श्वनाथ-कल्प २३
रुचि धार्मिक जनो के सन्तोषार्थ श्री पार्श्वनाथ का कल्प लेश-
मात्र कहूँगा।
भव दुख रूपी भार से परिपूर्ण अगो वाले भव्यो के भव-भ्रमण
नष्ट करने के लिए मैं इस कल्प को सक्षेप से कहता हूँ, सुनिए।
विजया, जया, कमठ, पद्मावती, पार्श्वयक्ष, वैकट्या, धरणेन्द्र
और सोलह विद्या देवियाँ जिनके अधिष्ठायक हैं। प्रतिमोत्पत्ति-
निदानकल्प मे कलित होने पर भी यहाँ उसे विस्तार भय से
संकलित नही किया क्योकि पीछे इसे कोई नही पढेगा।
जो व्यक्ति समुद्र को चुलु के समान कर ले व ताराओ के
विमानो की गिनती कर ले वह भी पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा
की महिमा को कहने मे समर्थ नही हो सकता।
यह पुराणप्रतिमा अनेक स्थानो मे संस्थापित होकर उपसर्ग
शान्ति के हेतु खेचरो, देवो और उत्तम पुरुषो से पूजी गई है।
जो इन्द्रादि द्वारा कीर्त्तित और महिमा कृत पार्श्वनाथ-प्रतिमा
है उसे मैं जन-मानस मे निश्चल भाव करने के लिए कहूँगा।
भारतवर्ष रूपी सरोवर मे भव्यजन-कमल को विकसित-बोधित
करते हुए सुर-असुरो द्वारा वन्दित चरणो वाले श्री मुनिसुव्रत
भगवान दिनकर की भाँति विचरते थे तब श्री पार्श्वनाथस्वामी
की यह प्रतिमा चम्पा नामक श्रेष्ठ नगरी के रत्नाकरोपकंठ मे
ज्योतीश्वरो से वर्णित थी।
कार्त्तिक सेठ के भव मे शक्र को इन्ही के ध्यान से व्रत ग्रहणा-
नन्तर सौ की संख्या मे अभिग्रह सिद्ध हुए थे। अत प्रतिमा के
माहात्म्य से मुग्ध सौधर्मेन्द्र महान् दिव्य विभूति से वही स्थित हो
पूजा-अर्चा करने लगा।
इस प्रकार कितना काल बीतने पर जब श्री रामचन्द्र जी ने
वनवास किया तो इन्द्र के वचन से लोगो को राघव का प्रभाव