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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

९४ विविध तीर्थ-कल्प
इसकी उपत्यका मे ऋषभदेवादि (जिनालयो से) अलंकृत
खंगार दुर्ग है और भगवान पार्श्वनाथ भूषित तेजलपुर है।
इसके दो योजन ऊँचे श्रृंग पर जिनालयो की श्रेणी शरच्चन्द्र
की किरणो जैसी निर्मल पुण्यराशि की भाँति सुशोभित है।
यहाँ श्री नेमिनाथ का सुन्दर चैत्य है और उसपर स्वर्णमय
दण्ड-कलश और आमलसार सुशोभित है।
यहाँ शिवादेवीनन्दन श्री नेमिनाथ भगवान् की चरणपादुका
के दर्शन, स्पर्शन और पूजन से शिष्ट लोगो के पाप-व्यूह नष्ट
होते हैं।
विशाल राज्य को पुराने तृण की भाँति छोडकर व स्नेहपूर्ण
बन्धुओ को त्याग कर प्रभु ने यहाँ महाव्रत स्वीकार किये।
उन प्रभु ने यही केवलज्ञान पाया और वे जगज्जनो का हित-
साधन कर यही से मोक्ष प्राप्त हुए। अतएव यहाँ मत्रीश्वर
श्री वस्तुपाल ने भव्य जनो के चित्त मे चमत्कृति करनेवाले तीन
कल्याणक मन्दिरो का निर्माण कराया।
यहाँ जिनेश्वर की प्रतिमाओ से पूर्ण इन्द्र-मण्डप मे श्री
नेमिनाथ भगवान का स्नान कराते हुए लोग इन्द्र की तरह
लगते हैं।
इस गिरिराज पर अमृतमय जल से पूर्ण गजेन्द्रपद नामक
कुण्ड है, जहाँ के जल से अर्हन्त भगवान का स्नात्र-न्हवण कराया
जाता है।
यहाँ वस्तुपाल के बनवाये हुए शत्रुञ्जयावतार चैत्य मे ऋषभ-
देव, पुण्डरीक, अष्टापद और नन्दीश्वर (स्थापित) हैं। स्वर्ण वर्ण
वाली सिंहवाहिनी अम्बिका सिद्ध¹ बुद्ध² पुत्रो से युक्त है, वह आम्र-
लुम्बधारिणी संघ के विघ्न हरण करती है।
श्री नेमिनाथ प्रभु के चरण-कमलो से पवित्रित अवलोकन
नामक शिखर के दर्शन करते भव्यजन कृतार्थता प्राप्त करते हैं।